पूर्वांचलवाराणसी
Trending

काशी विद्यापीठ में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का गरिमामय समापन –

वैश्विक पटल पर गूंजी भारतीय भाषा, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की आवाज -

 


वाराणसी:-  महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग द्वारा हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय अंतर-विषयी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भाषा, साहित्य, समाज और राजनीति पर वैश्विक चिंतन का प्रभाव’ का आज विधिवत एवं भव्य समापन हुआ। यह संगोष्ठी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी के कुशल संरक्षण, संयोजक व विभागाध्यक्ष प्रो. राजमुनि तथा सह-संयोजक प्रो. रामाश्रय सिंह की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुई।

दूसरे दिन तकनीकी सत्र का मुख्य विषय ‘समकालीन समाज, संस्कृति और वैश्विक राजनीति के बदलते आयाम’ रहा, जिसमें देश-विदेश के प्रख्यात विद्वानों ने भौतिक व आभासी (ऑनलाइन) माध्यम से प्रतिभाग कर गहन वैचारिक विमर्श प्रस्तुत किया।

प्रमुख वक्ताओं के विचार एवं मंथन :-

प्रो. अनुराग कुमार (सत्राध्यक्ष): अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. अनुराग ने रेखांकित किया कि “भाषा मरती नहीं है, मारी जाती है।” उन्होंने कहा कि भाषाई जीवन सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति पर निर्भर करता है। छठ जैसे लोकपर्वों और बोलचाल के सहज शब्दों के प्रभाव से हिंदी राष्ट्रभाषा के औपचारिक दर्जे के बिना भी वैश्विक धरातल पर निरंतर सशक्त और जीवंत बनी हुई है।

डॉ. शिप्रा शिल्पी (जर्मनी): ‘यूरोपीय परिप्रेक्ष्य में प्रवासी हिंदी विमर्श’ पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भाषा संस्कृति की वास्तविक संवाहक है। सर विलियम जोन्स द्वारा कालिदास के अनुवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने यूरोपीय संदर्भों में भारतीय भाषाओं के गहरे संबंधों को स्पष्ट किया तथा भाषाई समावेशिता के तहत क्षेत्रीय भाषाओं के संवर्धन पर बल दिया।

डॉ. ऋतु शर्मा (नीदरलैंड्स): ‘वैश्विक क्षितिज पर भारतीय संस्कृति और भाषा’ विषय पर ऑनलाइन उद्बोधन देते हुए डॉ. शर्मा ने ‘गिरमिटिया मजदूर’ इतिहास का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी प्रवासियों ने 16 संस्कारों और भाषा की स्मृति को सहेजकर रखा है। संस्कृति के संरक्षण व अगली पीढ़ी तक हस्तांतरण में महिलाओं की भूमिका को उन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

अर्चना पैन्यूली (डेनमार्क): प्रवासी साहित्यकार अर्चना पैन्यूली ने कहा कि 1980 के दशक से प्रवासी साहित्य ने वैश्विक पटल पर हिंदी का विस्तार किया है। अभिमन्यु अनत, उषा प्रियंवदा और ममता कालिया जैसे रचनाकारों के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विदेशी परिवेश और पात्रों के बावजूद प्रवासी साहित्य की आत्मा और नैतिक मूल्य विशुद्ध भारतीय हैं।

 डॉ. अविनाश कुमार सिंह: उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के प्रयोगों से भाषा गतिशील होती है। प्रशासनिक सीमाओं से बाहर निकलकर लोकभाषा ही संस्कृति का आधार बनती है। वर्तमान दौर में विदेशी एआई (AI) मॉडल्स के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदी और भारतीय भाषाओं की डिजिटल उपस्थिति व दृश्यता को सशक्त करना समय की मांग है।

 

आतिला कोतलावत (श्रीलंका): दक्षिण एशियाई संस्कृति और समाज पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा कि भारत और श्रीलंका के संबंध मात्र कूटनीतिक नहीं, बल्कि साझा आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत पर आधारित हैं। रामायण, अशोक वाटिका, विभीषण व हनुमान जी के ऐतिहासिक स्थल, ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का दर्शन दोनों देशों को एक अटूट सांस्कृतिक सूत्र में पिरोते हैं।

समीक्षा एवं समापन उद्बोधन :-

प्रो. राजमुनि (विभागाध्यक्ष एवं संयोजक): केरल के अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने भाषा के उत्थान में आत्म-अनुवाद और आधुनिक तकनीक की भूमिका को अपरिहार्य बताया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाषा, बोली और बौद्धिक चिंतन के महत्व को उन्होंने रेखांकित किया।

प्रो. राजेश कुमार मिश्र (संकायाध्यक्ष, मानविकी संकाय): समापन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. मिश्र ने कहा कि कोई भी भाषा छोटी या बड़ी नहीं होती; समाज के समग्र विकास हेतु बहुभाषिकता आवश्यक है। उन्होंने साहित्य को मानवीय अधिकारों और नैतिक मूल्यों का सच्चा संवाहक बताया।

प्रो. रामाश्रय सिंह (सह-संयोजक): धन्यवाद ज्ञापित करते हुए उन्होंने कहा कि मानवता विश्व की सबसे अमूल्य धरोहर है। इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने भारतीय भाषा और साहित्य को वैश्विक क्षितिज पर देखने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया है।
संगोष्ठी में इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार चौधरी, डॉ. रवीन्द्र कुमार गौतम, दर्शनशास्त्र
विभागाध्यक्ष प्रो. नंदिनी सिंह, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. नीरज धनकड़, मुख्य कुलानुशासक प्रो. अमरीश राय, प्रो. निरंजन कुमार सहाय, प्रो. अनुकूलचंद राय, डॉ. विजय कुमार रंजन, डॉ. सुरेंद्र प्रताप सिंह एवं डॉ. प्रीति सहित संकाय के प्राध्यापक उपस्थित रहे।

शोधार्थियों में जनमेजय, अंजना भारती, हनुमान, हेमलता, आकाश सिंह, धर्मेंद्र, आशीष मिश्रा, विश्वकर्मा भारती, बिंदा यादव, सोनाली रावत एवं प्रीति कुमारी ने सक्रिय भागीदारी निभाई। मंच का कुशल संचालन डॉ. राजमणि सरोज ने किया तथा आभार ज्ञापन शोधार्थी अंजना भारती एवं डॉ. शिव शंकर यादव द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया।

 

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button

You cannot copy content of this page