
वाराणसी :- काशी को भगवान शिव की नगरी और अविमुक्त क्षेत्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समस्त शिल्पकलाओं के आचार्य भगवान विश्वकर्मा ने काशी में भगवान शिव की आराधना कर दिव्य वरदान प्राप्त किया था। इसी प्रसंग से काशी स्थित विश्वकर्मेश्वर महादेव की महिमा जुड़ी हुई है।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति त्वष्टा के पुत्र विश्वकर्मा ने गुरुकुल में कठिन अध्ययन के दौरान अनेक परीक्षाओं का सामना किया। व्याकुल होकर वे एकांत वन में चले गए, जहां एक सिद्ध तपस्वी ने उन्हें मोक्षदायिनी काशी की ओर जाने की प्रेरणा दी। तपस्वी की आज्ञा पाकर विश्वकर्मा काशी पहुंचे और विधिपूर्वक शिवलिंग की प्रतिष्ठा कर तीन वर्षों तक घोर तपस्या की।
उनकी अचल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान महादेव प्रकट हुए और उन्हें ‘विश्वकर्मा’ नाम की सार्थकता का वरदान दिया। धार्मिक ग्रंथ में वर्णित श्लोक के अनुसार, समस्त भुवनों के निर्माण कार्यों, तंत्रों और शिल्पों के ज्ञान के कारण उनका ‘विश्वकर्मा’ नाम सर्वत्र प्रसिद्ध और अमर होने की बात कही गई है।
भगवान शिव ने काशी की महिमा बताते हुए कहा कि काशी में जिस भक्त ने शिवलिंग की प्रतिष्ठा, अर्चना और स्तुति की है, वह उनके स्वरूप का दर्पण बन जाता है। विश्वकर्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उनके द्वारा प्रतिष्ठित लिंग में सदैव विराजमान रहने और भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने का वरदान दिया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, विश्वकर्मा द्वारा प्रतिष्ठित इस लिंग की श्रद्धापूर्वक पूजा करने वाले भक्तों को सद्बुद्धि, मंगल और आध्यात्मिक कल्याण की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा आज भी काशी में अपने द्वारा प्रतिष्ठित विश्वकर्मेश्वर महादेव की आराधना में लीन हैं।
यहां है मंदिर:
श्री विश्वकर्मेश्वर महादेव मंदिर, श्री कण्वेश्वर महादेव एवं श्री हारीतेश्वर महादेव मंदिर परिसर, A-34/106, गोलगड्डा चौराहा, बस स्टैंड के बगल में, वाराणसी।



