
हिंदी दिवस पर लखनऊ विश्वविद्यालय में शब्दों और विचारों का उत्सव!
प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा — “भारतीय पत्रकारिता को भारतीय दर्शन के अनुरूप होना चाहिए।” प्रो. मनोज दीक्षित ने याद दिलाया — “मातृभाषाएं हमारी अस्मिता की संवाहक हैं।”
क्षितिज 5.0 में 300 विजेता छात्रों का सम्मान हुआ, और संवाद सत्रों में पत्रकारिता, संस्कृति व गीतों पर गहन चर्चा हुई।
लखनऊ/अयोध्या/बीकानेर। हिंदी दिवस के अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में 12 दिवसीय पुनर्श्चर्या पाठ्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि “भारतीय पत्रकारिता को भारतीय दर्शन के अनुरूप होना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि “हम भारत के लोग संचार, संवाद और शास्त्रार्थ की परम्परा के उत्तराधिकारी हैं।”

प्रो. द्विवेदी ने पत्रकारिता के योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्रकारिता ने हिंदी भाषा के लोकव्याप्तिकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि पत्रकारिता ने लोगों में नई चेतना का प्रसार किया, जबकि प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा कि पत्रकार समाजहित में सावधान और सतर्क दिशा-निर्देशक के रूप में कार्य करता है और हिंदी की नई चाल पत्रकारिता के साथ आरम्भ हुई।
इसी क्रम में आधुनिक भारतीय भाषा विभाग एवं काव्योम फ़ाउण्डेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हिंदी दिवस पखवाड़े के अंतर्गत ‘क्षितिज 5.0’ राज्यस्तरीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण समारोह भी संपन्न हुआ। इस अवसर पर रा.म.लो.अ. विश्वविद्यालय, अयोध्या एवं महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के पूर्व कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने 20 महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों के लगभग 300 विजेता छात्रों को पुरस्कृत किया।
समारोह को संबोधित करते हुए प्रो. दीक्षित ने कहा कि “मातृभाषाएं हमारी अस्मिता की संवाहक हैं” और हिंदी राष्ट्रीय अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखती है। उन्होंने छात्रों को प्रेरित किया कि हमें अपनी मातृभाषा में संवाद करना नहीं छोड़ना चाहिए और हिंदी के विस्तार के लिए अंग्रेज़ी व तकनीकी शब्दों को हिंदी शब्दकोश में जोड़ना चाहिए।
पुरस्कार वितरण से पूर्व तीन संवाद सत्र आयोजित किए गए।
- पहले सत्र में दैनिक जागरण के राज्य संपादक आशुतोष शुक्ल ने कहा कि पत्रकारिता समाज का आईना होती है, लेकिन पत्रकार समाज में रहते हुए भी उससे विरक्त रहता है। उन्होंने यह भी कहा कि पत्रिकाओं के बंद होने के पीछे पठनीयता का संकट है और आज की प्रिंट मीडिया ए.आई. तक पहुँच चुकी है।
- दूसरे सत्र में अभिनेता कुशल दुबे ने संस्कृति और भाषा को कभी न भूलने की अपील की।
- तीसरे सत्र में गीतकार ज्ञानप्रकाश आकुल ने कहा कि गीत लय और ताल से ही जादुई करिश्मा करते हैं।
कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्र-शिक्षक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।



