अमीरों का प्रदूषण, गरीबों पर संकट! दुनिया के 80 लाख धनकुबेरों का कार्बन उत्सर्जन 350 करोड़ गरीबों से भी ज्यादा –

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में जलवायु असमानता पर बड़ा खुलासा, सबसे अमीर एक प्रतिशत आबादी के सालाना उत्सर्जन से भविष्य में 19 लाख अतिरिक्त गर्मी-संबंधी मौतों का अनुमान –
नई दिल्ली :-
दार्शनिक समाचार।

दुनिया में बढ़ती गर्मी, विनाशकारी बाढ़, सूखे और प्राकृतिक आपदाओं के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन है और इसकी सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है? अंतरराष्ट्रीय संगठन ऑक्सफैम की रिपोर्ट ने इस सवाल को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों का कार्बन उत्सर्जन सबसे गरीब 44 प्रतिशत आबादी के कुल उत्सर्जन से भी अधिक है।
करीब 80 लाख अत्यधिक संपन्न लोगों से जुड़ा कार्बन उत्सर्जन लगभग 350 करोड़ गरीब लोगों के संयुक्त उत्सर्जन से अधिक बताया गया है। यह आंकड़ा जलवायु संकट और आर्थिक असमानता के बीच गहरे संबंध को उजागर करता है।
अमीरों की जीवनशैली और निवेश से बढ़ रहा प्रदूषण
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के अत्यधिक संपन्न लोगों की विलासितापूर्ण जीवनशैली कार्बन उत्सर्जन का एक महत्वपूर्ण कारण है। निजी विमान, महंगी गाड़ियां, बड़े आवास, अत्यधिक ऊर्जा खपत और लगातार हवाई यात्राएं उनके कार्बन फुटप्रिंट को बढ़ाती हैं।
इसके अतिरिक्त तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योगों में निवेश भी उत्सर्जन में योगदान देता है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा है।
19 लाख अतिरिक्त मौतों की आशंका
ऑक्सफैम की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि दुनिया के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के एक वर्ष के कार्बन उत्सर्जन से भविष्य में अत्यधिक गर्मी के कारण लगभग 19 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
यह आंकड़ा भविष्य के जलवायु प्रभावों का मॉडल आधारित अनुमान है, न कि अब तक दर्ज की गई मौतों की संख्या।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों का सामना गरीब समुदायों को अधिक करना पड़ता है, क्योंकि उनके पास सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदाओं से उबरने के लिए सीमित संसाधन होते हैं।
2050 तक एक अरब लोगों के विस्थापन का खतरा
रिपोर्ट में उद्धृत अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2050 तक जलवायु परिवर्तन और उससे संबंधित परिस्थितियों के कारण लगभग एक अरब लोगों को विस्थापन का खतरा हो सकता है।
बाढ़, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, सूखा और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी परिस्थितियां बड़ी आबादी को अपना घर और रोजगार छोड़ने के लिए मजबूर कर सकती हैं।
हालांकि, यह संभावित विस्थापन का अनुमान है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया का हर दसवां व्यक्ति निश्चित रूप से बेघर हो जाएगा।
निजी विमानों के प्रदूषण पर भी सवाल
रिपोर्ट में निजी विमानन गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन पर भी चिंता व्यक्त की गई है। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में निजी विमानों से लगभग 1.6 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होने का दावा किया गया है।
निजी विमानन का उपयोग सीमित संख्या में संपन्न लोग करते हैं, जबकि इससे उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसें वैश्विक जलवायु परिवर्तन में योगदान देती हैं।
हालांकि, बिजली उत्पादन, परिवहन, उद्योग और कृषि सहित अनेक गतिविधियां भी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।
आपदा में गरीबों की बर्बादी, पुनर्निर्माण में कारोबार
ऑक्सफैम की रिपोर्ट में जलवायु संकट से जुड़े व्यावसायिक हितों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के ‘डिस्ट्रॉय एंड रीबिल्ड इंडेक्स’ में 217 ऐसी कंपनियों की पहचान किए जाने का दावा है, जिनकी गतिविधियां प्रदूषणकारी उद्योगों के साथ आपदा राहत और पुनर्निर्माण से जुड़े कारोबार में भी शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2029 तक वैश्विक आपदा राहत और पुनर्निर्माण बाजार सालाना 92 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
यह स्थिति इस सवाल को जन्म देती है कि जिन आर्थिक गतिविधियों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, क्या उनसे जुड़े व्यावसायिक हित आपदाओं के बाद होने वाले पुनर्निर्माण से भी लाभ उठा रहे हैं?
जलवायु संकट से महंगाई और खाद्य सुरक्षा पर खतरा
जलवायु परिवर्तन का असर खेती और खाद्य उत्पादन पर भी पड़ रहा है। अनियमित बारिश, लंबे सूखे और अत्यधिक तापमान से फसलों को नुकसान पहुंच सकता है।
उत्पादन घटने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का खतरा रहता है। इसका सबसे अधिक असर गरीब परिवारों पर पड़ता है, जिन्हें अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करना पड़ता है।
जलवायु न्याय की मांग क्यों जरूरी?
ऑक्सफैम की रिपोर्ट यह संदेश देती है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल आम नागरिकों से ऊर्जा बचाने की अपील पर्याप्त नहीं होगी। बड़े उत्सर्जकों, प्रदूषणकारी उद्योगों और अधिक कार्बन खपत वाली आर्थिक गतिविधियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी।
साथ ही, जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित गरीब और कमजोर समुदायों को सुरक्षा, आर्थिक सहायता तथा आपदाओं से उबरने के बेहतर साधन उपलब्ध कराना आवश्यक है।
जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक असमानता, सामाजिक न्याय और मानव जीवन की सुरक्षा का भी सवाल बन चुका है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब कार्बन उत्सर्जन में योगदान असमान है, तो जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी और उसकी भरपाई का बोझ समान क्यों हो?



