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रामनगर रामलीला के अंतिम दिन भावनाओं का सैलाब, प्रभु श्रीराम की विदाई पर नम हुईं श्रद्धालुओं की आंखें –

 

रामनगर रामलीला के अंतिम दिन की लीला – 

 

जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।।
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।।
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।।
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।

आज की लीला में चारो भाई अयोध्यावासी और हनुमान जी महाराज बग्गी पर सवार होकर अवधबाग रामबाग में आते है। जहां भगवान का दर्शन करने के लिए चारो ब्रम्ह संकादिक सनक, सनंदन , सनत्क और कुमार आते है को भगवन उनको बैठा के सम्मान करते है फिर सभी बाल ब्रम्ह ( ये चारो बाल रूप में है रहते है ऐसा उनको वरदान रहता है) भगवान का गुणगान करते है।फिर भरत जी को राम जी संत के लक्षण बतलाते हैं।

संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥ काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।
अर्थ देखे तो,,संत और असंतों की करनी ऐसी
है जैसे कुल्हाड़ी और चंदन का आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चंदन को काटती है (क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षों को काटना है), किंतु चंदन अपने स्वभाववश अपना गुण देकर उसे (काटने वाली कुल्हाड़ी को) सुगंध से सुशोभित कर देता ह
आगे तुलसी दास जी लिखते है। 

ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड ॥

अर्थ देखे तो,,,इसी गुण के कारण चंदन
देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत् का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ी के मुख को यह दंड मिलता है कि उसको आग में जलाकर फिर घन से पीटते हैं।। आगे बाबा ने बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है ।मैं कितना लिखूं मेरी सामर्थ्य में नहीं।भगवान के मुख से ज्ञान की गंगा बहती है सभी अयोध्यावासी और सभी भाई उस ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाते है।तत्पश्चात नारद जी भी आते है और भगवान की बहुत भांति से वंदना करते है। तत्पश्चात सभी अयोध्या वापस आते है।आज लीला का अंतिम दिवस रहता है।आज के दिन ही महाराज काशी नरेश सभी पांच मूर्तियों को अपने किले में निमंत्रण पत्र देके बुलवाते है। फिर किले में उनका पूजन करके भोग प्रसाद पवाते है।और पंच मूर्ति बने बालकों को बहुत से दान दक्षिणा देकर विदा करते है। और उनके झूठे भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है।फिर भगवान अयोध्या वापस आते है और आज की आरती की खास बात यह है की आज महाराज नही आते है आज यह आरती केवल लीला प्रेमी नेमि लोगो के लिए होता है आज की आरती माता कौशल्या जी ही करती है।
आज की आरती में एक अलग ही दुख की रेखा होती है। जो लीला प्रेमी को लीला समाप्त होने की होती है ।सच कहा गया है कि सुख के दिन बहुत जल्दी ही चले जाते है बहुत से लीला प्रेमी की आंखों में आसूं थे।
मेरे भी जीवन का एक भाग हो गया था लीला देखना लीला के बारे में लिखना,लीला प्रेमी के दुख को शब्दो में तो नही बताया जा सकता है पर ये एक लीला प्रेमी ही समझ सकता है।यही अपने कथा प्रसंग लेखन को विराम देता हूं परंतु अपने अज्ञानी कुटिल छोटी बुद्धि से प्रभु के गुणगान करता रहूंगा।

जय राम जी की – 
हर हर महादेव – 

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