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काशी विद्यापीठ में ‘भाषा, साहित्य, समाज और राजनीति पर वैश्विक चिंतन के प्रभाव’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी –

 

वाराणसी:-  महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग के तत्वावधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में ‘भाषा, साहित्य, समाज और राजनीति पर वैश्विक चिंतन का प्रभाव’ विषय पर दो दिवसीय अन्तर्विषयी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी के संरक्षण में संपन्न हुआ। संगोष्ठी के संयोजक एवं विभागाध्यक्ष प्रो. राजमुनि तथा सह-संयोजक प्रो. रामाश्रय सिंह रहे।

उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने नागरी लिपि और हिंदी के वैश्विक विकास पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी भाषा और साहित्य के विकास में लिपि की भूमिका आधारभूत होती है। भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए नागरी लिपि को मजबूत करना आवश्यक है। इस दौरान हिंदी के संवैधानिक इतिहास और राजभाषा बनने की यात्रा पर भी प्रकाश डाला गया।

मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. अजमेरी सिंह काजल ने कहा कि साहित्य और भाषा मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण तथा समाज के सर्वांगीण विकास के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

साहित्य की स्वतंत्रता और सामाजिक सरोकार पर विमर्श  –

अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने ‘साहित्य, समाज व विभाजन’ विषय पर विचार रखते हुए कहा कि साहित्य का मूल तत्व ‘स्वच्छंदता’ है और इसे बाहरी प्रभावों से मुक्त रहना चाहिए। उन्होंने जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया के साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया। साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजनकारी ऐतिहासिक संदर्भों की चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य का अंतिम ध्येय स्वतंत्रता, समता और न्याय की स्थापना होना चाहिए।

लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. कालीचरण स्नेही ने हिंदी में मौलिक ‘ज्ञान उत्पादन’ की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए लोकतंत्र, मानवीय गरिमा और वृद्ध विमर्श जैसे विषयों पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि जातिवाद और संकीर्णताओं से ऊपर मनुष्यता सर्वोच्च मूल्य है।

तजाकिस्तान से आए प्रो. जावेद खोलोव ने ‘मध्य एशिया में भारतीय भाषा विमर्श’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने भारतीय भाषा और संस्कृति की वैश्विक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए भाषा शिक्षण के आधुनिकीकरण के लिए उन्नत पाठ्यपुस्तकों, भाषा प्रयोगशालाओं और डिजिटल अध्ययन सामग्री के विस्तार की आवश्यकता बताई।

सिंगापुर की प्रो. अनुसूया साहू ने ‘प्रवासी साहित्य एवं वैश्विक हिंदी’ पर चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी को केवल औपचारिक आयोजनों और भाषणों तक सीमित न रखकर परिवार और दैनिक बोलचाल की भाषा बनाना समय की आवश्यकता है।

हाशिए के समाज और समकालीन साहित्य पर चर्चा  –

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. विपिन कुमार ने समकालीन अस्मितामूलक विमर्शों पर चर्चा करते हुए कहा कि वैश्विक चिंतन के दौर में किसान और आदिवासी समाज भी उपेक्षा का सामना करते रहे हैं। उन्होंने दलित, स्त्री, आदिवासी, किन्नर और वृद्ध विमर्श को हाशिए के समाजों की महत्वपूर्ण आवाज बताया।

प्रसिद्ध साहित्यकार एवं चिंतक प्रो. सुशीला टाकभौरे ने ‘समकालीन साहित्य और सामाजिक विमर्श’ विषय पर कहा कि साहित्य समाज का सजीव दर्शन है। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी का साहित्य संकीर्ण रूढ़ियों से आगे बढ़कर हाशिए के वर्गों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है, जिससे समतामूलक और न्यायप्रिय समाज की आधारशिला मजबूत हो रही है।

वरिष्ठ साहित्यकार रूपनारायण सोनकर ने अपनी रचनाओं के संदर्भ में वैश्विक साहित्य की प्रवृत्तियों की चर्चा करते हुए हिंदी भाषा के सामाजिक प्रभाव, समकालीन चुनौतियों और वैश्विक विस्तार पर विचार रखे।

संगोष्ठी में प्रो. निरंजन कुमार सहाय, प्रो. अनुकूलचंद राय, डॉ. अविनाश कुमार सिंह, डॉ. विजय कुमार रंजन, डॉ. सुरेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. प्रीति सहित अनेक शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। शोधार्थियों में जनमेजय, अंजना भारती, हनुमान, हेमलता, आकाश सिंह, धर्मेंद्र, आशीष मिश्रा, विश्वकर्मा भारती, बिन्दा यादव, सोनाली रावत और प्रीति कुमारी ने सक्रिय सहभागिता की।

विभिन्न सत्रों का मंच संचालन डॉ. राजमणि सरोज ने किया। शोधार्थी अंजना भारती ने आभार व्यक्त किया, जबकि औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिव शंकर यादव ने किया। संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्टिंग विश्वकर्मा भारती ने की।

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