
कुछ पुलिसकर्मियों की वजह से बदनाम हो रहा है पुलिस विभाग…!
पुलिस उपायुक्त पूर्वी का उद्देश्य पूर्वी में कानून व्यवस्था बरकरार रहे और पीड़ित संतुष्ट रहे, पर मिट्टी पलीत करने के लिए पूर्वी जोन में मौजूद हैं कुछ पुलिसकर्मी –
लखनऊ:- पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ के पूर्वी जोन में ऐसे पुलिसकर्मी मौजूद हैं, जो चौकियों में तैनात होने पर वादी/पीड़ित को संतुष्ट करने में असमर्थ हैं, वहीं विवेचना की जिम्मेदारी सौंप दी जाय, तो विवेचना निस्तारण में सफलता प्राप्त करने में बिल्कुल असमर्थ हैं। अगर साफ तौर पर कहा जाए, तो पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ के पूर्वी जोन में राजन केसरी जैसे पुलिसकर्मी मौजूद हैं, जो विवेचना निस्तारण में असमर्थ तो हैं ही, इस योग भी नहीं है कि अपने क्षेत्र में कानून व्यवस्था संभाल पाएं, फिर भी अपने पद पर बने हुए हैं और उच्च अधिकारी एक के बाद एक इस भरोसे जिम्मेदारी सौंप रहे हैं कि उनके निर्देश का पालन हो, साथ ही जो शिकायतें हैं वे दूर हों, पर जब गंभीरता से उच्च अधिकारी देखेंगे तो उन्हें भी अफसोस होगा ऐसे पुलिसकर्मी पर….
पुलिस उपायुक्त पूर्वी शशांक सिंह के निर्देशन पर पूर्वी जोन की पुलिस में कई ऐसे पुलिसकर्मी हैं जिन्होंने निर्देश का बखूबी पालन भी किया है और अपने जिम्मेदारियों व कर्तव्य को निभाते हुए अपने जोन का मान सम्मान भी बढ़ा रहे हैं। पर इत्तेफाक की बात है कि जब पुलिस उपायुक्त पूर्वी अपने जोन में कानून व्यवस्था, अतिक्रमण, पीड़ितों की समस्या का समाधान आदि में सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से अपने जोन की पुलिस टीम को लगातार निर्देशित व नेतृत्व करते हैं पर ऐसे भी राजन केसरी जैसे पुलिसकर्मी मौजूद हैं जोन में, जो पुलिस उपायुक्त पूर्वी के सामने तो ईमानदार और कर्तव्यबद्ध दिखाने में पीछे नहीं हटेंगे, पर जैसे ही पुलिस उपायुक्त पूर्वी का ध्यान एक मामले से दूसरे मामले पर पहुँचता है, वैसे ही अपनी आदत में ढल जाते हैं। बेकार और गैर जिम्मेदार विवेचक अपनी जिम्मेदारियां को भूल जाते हैं, सिर्फ क्षेत्र में हो रहे फायदे के बारे में गंभीर हो जाते हैं। एक पुरानी कहावत है कि तालाब में सभी मछलियां बराबर नहीं होतीं ….
बड़े अफसोस के बाद कहना पड़ रहा है कि पूर्वी जोन में राजन केसरी जैसे पुलिसकर्मी मौजूद हैं, जो अपने पद पर बने रहने के लायक भी नहीं है, फिर भी रियायत के बलबूते छोड़ दिए जाते हैं, यह सोच कर कि शायद वे सुधर जाएं। पर ईमान डोलता है अपनी आदतों को कैसे छोड़ दें…
यदि राजन केसरी जैसे अन्य पुलिसकर्मी जो विवेचना निस्तारण करने में असमर्थ हैं और अपने क्षेत्र में कानून व्यवस्था बरकरार रखने में असफल रहे हैं, को जिम्मेदारी सौंप कर व उन पर भरोसा जता कर एक मौका दिया जाता है, कि शायद वे सुधर जाएं, पर अफसोस है सुधरने का नाम ही नहीं लेते। अपने फायदे के चक्कर में जिम्मेदारियां को भूलकर सिर्फ इस बात का ख्याल रखते और गंभीर रहते हैं कि क्षेत्र में किससे क्या फायदा प्राप्त हो सकता है। ऐसा भी देखा गया है कि ठेले, अतिक्रमण और रेस्टोरेंट व होटल के भरोसे उनकी रोजी-रोटी भी चल रही है, वर्दी पहनने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को किनारे रख कर व्यवहार बनाने में व्यस्त हैं। वैसे भी व्यवहार भी फायदे के बगैर नहीं। शायद ईमानदारी रास नहीं आती। अपने जोन एवं क्षेत्र में अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। पर राजन केसरी जैसे पुलिस कर्मियों का पेट ही नहीं भरता और ना ही उनका चरित्र बदलता है। चूंकि अपने क्षेत्र में जिम्मेदारी और कर्तव्य को निभाने के साथ-साथ विवेचना निस्तारण कर पीड़ित/वादी को संतुष्ट करना उन्हें आता नहीं। फिर भी उच्च अधिकारी और खास तौर पर पुलिस उपायुक्त पूर्वी शशांक सिंह जोन के पुलिसकर्मियों का हौसला बढ़ाने के लिए उनके साथ खड़े रहते हैं, पर ऐसे पुलिसकर्मी जिनकी वजह से जोन की पुलिस की बदनामी हो रही है, अन्य भरोसा जताना, शायद एक तरफ और इशारा करता है कि वह सुधर जाएं , पर आदत है जो सुधरती नहीं…



