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नारी को अबला नहीं, लक्ष्मीबाई समझो – जो अकेले पूरे साम्राज्य से टकरा सकती है : शालिनी वर्मा –

 

लखनऊ:- आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद महानगर द्वारा,लखनऊ विश्वविद्यालय के जे०के सभागार में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती की पूर्व संध्या पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया,प्रवासी कार्यकर्ता के रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय मंत्री शालिनी वर्मा विशेष रूप से उपस्थित रही। मंच पर उपस्थित राष्ट्रीय मंत्री शालिनी वर्मा,प्रांत उपाध्यक्ष प्रो०मंजुला उपाध्याय,महानगर उपाध्यक्ष डॉ०राकेश तिवारी, सह मंत्री अंशिका सिंह ने एक साथ युवाओं के प्रेरणाश्रोत स्वामी विवेकानंद एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।

संगोष्ठी में उपस्थित युवा तरुनाई को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय मंत्री ने कहा 1857 की क्रांति यानी आज से लगभग 168 साल पहले महिलाओं का योगदान राष्ट्र निर्माण में हो इसे रानी लक्ष्मीबाई ने सुनिश्चित किया। झाॅसी के गणेश मंदिर में प्रतिवर्ष महिलाओं का एक उत्सव हल्दी कुंकू नाम से आयोजित होता था इस उत्सव में नगर के प्रमुख एवं आम धरानों की भी महिलाएं आती थीं। इसी उत्सव के माध्यम से सुन्दर, मुन्दर, जूही, झलकरी, काशीबाई आदि किशोरियाॅं और तरूणियों लक्ष्मीबाई की सहेलियां बन गई। रानी ने सबको घुडसवारी और शस्त्राभ्यास कराया। इस तरह उन्होंने एक स्त्री-सेना ही खडी कर दी जिसने आगे चलकर अंग्रेजों के साथ युद्ध में भाग लिया। झाॅसी की प्रत्येक महिला का योगदान इस समर में हो इसलिए उन्होंने झाॅसी की प्रत्येक महिला से आग्रह किया कि वे हल्दी कुंकू के उत्सव के समय अपने गहनों में से कुछ न कुछ दें और रानी इसके बदले उन्हें वह हल्दी कुंकू देंगीं। इस तरह प्रत्येक महिला का इस समर में मानसिक योगदान दिलवाया। इस तरह प्रत्येक महिला में राष्ट्रीय भाव का जागरण करने का दृष्टिकोण उनके जीवन को देखने से मिलता है। यह दर्शाता है कि वह झांसी साम्राज्य के घर घर के दिलों पर राज करती थी। आज के कथित बुद्धिजीवियों का एक प्रिय विषय है, नारी स्वतंत्रता, स्त्री सशक्तिकरण। रेखांकित करें, कथित बुद्धिजीवी शब्द को। ऐसा इसलिए कि यह विषय संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। पर भारत में रह कर अभारतीय सोच रखने वाले जब इस विषय को केन्द्र में रख कर भारतीय संस्कृति को, भारतीय परम्परा को कठघरे में खड़ा करते हैं तो उनके बौद्धिक दीवालिएपन पर तरस आता है। हम उनकी बुद्धि की सीमाएं जानते हैं, इसलिए वह रामायण, महाभारत को समझ पाएंगे, इसकी संभावना कम ही है। पर क्या वे अपनी स्मृति को ज्यादा नहीं सिर्फ 168 साल पीछे ले जाने का कष्ट करेंगे?करेंगे तो पाएंगे कि महारानी लक्ष्मीबाई, सिर्फ वीरांगना ही नहीं है, वह बोल्ड भी है ब्यूटीफूल भी है और स्त्री सशक्तिकरण का साक्षात उदाहरण है।

महानगर उपाध्यक्ष डॉ०राकेश तिवारी ने बताया रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा साक्षात शक्ति का प्रतीक है। यद्यपि स्त्री प्रमुख रूप से निर्माण और संवर्धन शक्ति है पर आवश्यकता होने पर दुष्टों के लिए संहारक भी हो सकती हैं। यह रानी के जीवन से सीख सकते हैं। आभार ज्ञापन महानगर सह मंत्री अंशिका सिंह ने कहा,मंच संचालन महानगर सह मंत्री सरिता पाण्डेय ने किया। रानी लक्ष्मी बाई के जीवन विषयक आयोजित इस संगोष्ठी में अभाविप के प्रांत मंत्री व विभाग संगठन मंत्री पुष्पेंद्र बाजपेई सहित तमाम छात्र एवं छात्राएं उपस्थित रहे।

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