रामनगर रामलीला; केकई का श्री दशरथ जी दो वर मांगना; श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास श्री भरत जी को राजगद्दी –

✍️अजीत उपाध्याय
वाराणसी:- बीते कल विश्व प्रसिद्ध रामनगर रामलीला के आठवे दिन का प्रसंग –
नृप जुबराज राम कहूं देहु। जीवन जन्म लाहू किन लेहु।
जेहि भांति सोकु कलंकु जाई उपाय करी कुल पालही, हठी फेरू रामही जात जानि बात दूसरी चालही।।

आज की कथा का शुभारंभ एक क्षेपक कथा से होता है जिसमें नारद जी भगवन राम से मिलने अयोध्या आते हैं।बड़े प्रेम से राम जी नारद जी का पाद्य प्रक्षालन करते है। नारद जी देवताओं की ओर से उन्हें यह कहने आते हैं कि अब वह लीला का समय आ गया जिसमें आप रावण को मारिए और देवता जनों को सनाथ करिए। तब भगवन कहते है कि इंद्र से कहिएगा की मुझे सब स्मरण है और मैं आप लोग के ही कार्यों में लगा हुआ हूं। तत्पश्चात कथा अयोध्या के राज महल से शुरू होता है जहां महाराज दशरथ आईने के सामने अपने केश को सफेद देखकर अपने आप को चौथेपन में देखकर भगवान श्रीराम को राजा बनाने की इच्छा सभी राजमहल के वरिष्ठ लोगों के सामने रखते है। ये सुनकर सभी बहुत प्रसन्न होते है। महाराज गुरु के पास श्री राम जी को महाराज बनाने के सभी उचित प्रबंध को पूछने के लिए जाते है। जब गुरु महाराज के द्वारा राम जी को यह पता चलता है कि उन्हें राजा बनाने की तैयारी की जा रही वो बहुत दुखी होते है।बाबा लिखते है कि,
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा॥
अर्थ देखे तो,
हम सब भाई एक ही साथ जन्मे, खाना, सोना, लड़कपन के खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए॥
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई। पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही (मेरा ही) होता है। (तुलसीदासजी कहते हैं कि) प्रभु श्री रामचन्द्रजी का यह सुंदर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तों के मन की कुटिलता को हरण करे॥ भगवन इस निर्णय से प्रसन्न नहीं होते। भगवन तो इतने दयालु है कि जब भरत जी वहां नहीं होते तो वो पूरा खेल ही रच देते है कि भरत जी का गुण सभी के सामने आए की वो कितने बड़े धर्मात्मा है। भगवन तो सर्वदा ही अपने भक्तों को ही बड़ाई देना चाहते। मुझे तो जो भी थोड़ा बहुत राम कृपा से भाव आता है कि रावण को तो मारने के लिए भगवन यह लीला तो रचते ही है परंतु भरत जी जैसे धर्मात्मा का गुण लोगो के सामने उजागर हो इसलिए भी भगवन यह खेल रचते है। तत्पश्चात चारो तरफ श्रीराम जी के राजा होने की चर्चा होती है और इसकी चर्चा अयोध्या ही नहीं आकाश में भी होती है। सभी देवता ये सुनकर अधीर हो जाते है। इंद्र माता सरस्वती जी से अपने अधीर होने का कारण कहते है तब भगवन के ही संकेत से देवी सरस्वती यहां अयोध्या में बैठी मंथरा कुबड़ी की मती को फेर देती है तब वह महारानी केकई के पास जाकर उनको बहुत से कुचाली नीतियों को बताकर उनको कोप भवन में जाने को कहती है।तब महारानी कोप भवन में चली जाती हैं जब महाराज को ये खबर मिलती है तो वो वहां जाते है। महारानी की ये हालत देखकर वो उनके दुख का कारण पूछते है। जब महाराज राम की सपथ लेते है तब महारानी उनसे दो वर मांगती है एक से भरत को राज्य को दूसरे से श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मांगती हैं। ये सुनकर महाराज वैसे हो जाते है जैसे जल के बिना मछली। सारे अयोध्या वासी जब महाराज को अगली सुबह राज सभा में नहीं पाते तो मंत्री सुमंत्र को महाराज के पास भजते है। सुमंत्र जी सारा समाचार सुन के राम जी के पास जाते है। राम जी कोप भवन जाकर पिता कि हालत देखकर दुखी होते है और उनसे उसका कारण पूछते है तब महारानी सभी बात को बताती हैं, राम जी महाराज दशरथ को बहुत समझाते हैं और कहते है मैं वही करूंगा जिसमे कुल की कीर्ति में कलंक ना हो।।सभी अयोध्यावासी तरह तरह की बातें करते है कोई महाराज को दोष तो कोई महारानी को दोष तो कोई भरत जी को तो कोई भाग्य को दोष देता है । तत्पश्चात राम जी माता कौशल्या के पास जाते है । वहां माता उनको मंगल कामना का आशीर्वाद देते है तब भगवान माता से कहते है कि पिता श्री ने मुझे वन का राज्य दिया है, मैं आपसे आज्ञा लेने आया हूं। माता कौशल्या सोच में पड़ जाती है तब राम जी के सचिव, माता कौशल्या को कैकेई जी की सारी कुचाल कहते है। माता कौशल्या जी श्री राम जी से कहती है, हे !पुत्र यदि पिता की आज्ञा हो तो माता को बड़ी जानकर मत जाओ और पिता माता दोऊ वन जाने को कहे तो वन तुमको सौ अयोध्या के समान है और ऐसा वो क्यों न कहे माता जो प्रभु श्री राम की है। वन जाने की सूचना सिया जी को मिलते ही वो व्याकुल मन से प्रभु श्री राम के पास आती है और साथ चलने की बात कहती है।यही आज के कथा का विश्राम हो जाता है। आज की आरती में मुझे एक दुख की रेखा का अनुभव होता है आज की आरती माता कौशल्या जी के द्वारा होती है।



