पत्रकारिता का घिनोना खेल ,जहाँ वसूली की चादर ओढ़ अपराध के सारथी है ब्लैकमेलर
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसकी जिम्मेदारी सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना और भ्रष्टाचार को उजागर करना है। लेकिन जब कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ लेकर वसूली का धंधा शुरू कर देते हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान केवल किसी अधिकारी या व्यापारी का नहीं, बल्कि पूरी पत्रकारिता की विश्वसनीयता का होता है !
उत्तर प्रदेश में कई जनपदों में ऐसे स्वयंभू पत्रकार देखने को मिल जाते हैं जिनका उद्देश्य खबर नहीं, बल्कि डर पैदा करके पैसा वसूलना होता है। हाथ में मोब, गले में प्रेस कार्ड और सोशल मीडिया पर तथाकथित न्यूज़ चैनल का नाम लेकर वे अधिकारियों, व्यापारियों और आम लोगों पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। यही नहीं अब तो पैसे की लालच ने बड़का पत्रकार जो दिन भर श्रेष्ठ होने की कवायत में जुटा रहता है वह वसूली का मास्टरमाइंड पहले तो अधिकारियों से सेटिंग गेटिंग कर माल कमाता था अब वसूली में भी हिस्सेदार है !
बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों के संवाददाता जिनकी वसूली महीने की हजारों की है वह हफ्ता वसूली के रूप में धन जुटा रहे हैं ! जिसकी जानकारी स्थानीय प्रशासन को भली भाती है कलम को धार देकर समाज की कुरीतियों पर जोरदार प्रहार करने के बजाय जुआड़ी और अपराधी को संरक्षण देकर धन संचय करते हैं ! यह पत्रकार कभी समाज के लिए ही हितैषी नहीं हो सकता यह अपराधी से भी बढ़कर है ! संरक्षण देने वाला कलम का सिपाही और वर्दी में रक्षक दोनों ही समाज के भक्षक बन बैठे हैं! समाज जब पत्रकार और वसूली करने वाले व्यक्ति में अंतर करना छोड़ देता है, तब लोकतंत्र भी कमजोर होने लगता है ! अधिकारियों के समक्ष बड़ी-बड़ी बातें और खबर की सौगातो से अभिनंदन करना महिमा मंडन करना कलम के सौदागरों का आज स्वभाव बन चुका है !
यह उतना ही सच है कि ऐसे मामलों में केवल फर्जी पत्रकार ही दोषी नहीं होते! यदि कोई अधिकारी या कारोबारी अवैध भुगतान करके मामले को दबाने का प्रयास करता है, तो वह भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। कानून का भय समाप्त होते ही वसूली का यह खेल और मजबूत होता जाता है!
समय की मांग है कि पत्रकार संगठनों, मीडिया संस्थानों और प्रशासन को मिलकर ऐसे लोगों की पहचान कर उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए ! साथ ही, वास्तविक पत्रकारों को भी आत्ममंथन करना होगा कि कुछ लोगों की गलत हरकतों से पूरे पेशे की गरिमा पर आंच न आने पाए !
पत्रकारिता का उद्देश्य सच को सामने लाना है, न कि सच का सौदा करना! जो लोग पत्रकारिता की आड़ में वसूली करते हैं, वे केवल कानून के अपराधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र और समाज के भी गुनहगार हैं। ऐसे तत्वों पर कार्रवाई जितनी सख्त होगी, पत्रकारिता की प्रतिष्ठा उतनी ही मजबूत होगी !



