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पर्यावरणीय-चेतावनी ; रेत खनन और खनिज दोहन से सूखती नदियां ; 50 साल में 18 लाख जलधाराएं लुप्त —

अनियोजित भूमि उपयोग और अवैध रेत खनन ने बढ़ाया जल संकट;हर दिन खो रही हैं 99 प्राकृतिक धाराएं, IIT धनबाद के शोध में खुलासा --

 

 

दिल्ली  :-– गंगा नदी का अस्तित्व आज एक अभूतपूर्व और अदृश्य संकट से गुजर रहा है। आईआईटी धनबाद के पर्यावरण विज्ञान इंजीनियरिंग विभाग के नवीनतम शोध के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी बेसिन की करीब 18 लाख छोटी जलधाराएं स्थायी रूप से विलीन हो चुकी हैं। औसतन हर दिन 99 प्राकृतिक धाराएं खत्म हो रही हैं।

आईआईटी धनबाद के पर्यावरण विज्ञान इंजीनियरिंग विभाग के नवीनतम शोध के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी बेसिन की करीब 18 लाख छोटी जलधाराएं पूर्णतः विलीन हो चुकी हैं। हम हर दिन औसतन 99 प्राकृतिक जलधाराओं को स्थायी रूप से खो रहे हैं। यह शोध सात छोटी नदियों और उनके 56 वाटरशेड्स के गहन विश्लेषण पर आधारित है, जो गंगा के महाप्रवाह का हिस्सा बनती हैं। इस शोध में जिन सात प्रमुख छोटी नदियों की शिनाख्त की गई है, उनमें बुंदेलखंड की जीवनरेखा मानी जाने वाली खुदार, उर्मिल और बोदला (जो केन व बेतवा की उप-सहायक धाराएं हैं) प्रमुख हैं।

यह शोध सात छोटी नदियों और उनके 56 वाटरशेड्स के गहन विश्लेषण पर आधारित है, जो गंगा के महाप्रवाह का हिस्सा बनती हैं। इनमें बुंदेलखंड की जीवनरेखा मानी जाने वाली खुदार, उर्मिल और बोदला जैसी नदियां शामिल हैं, जो केन और बेतवा की उप-सहायक धाराएं हैं। इन वाटरशेड्स के सिकुड़ने का सीधा असर केन और बेतवा के प्रवाह पर पड़ रहा है और अंततः यह कमी गंगा की मुख्यधारा तक पहुंच रही है।

शोध में पाया गया कि अनियोजित भूमि उपयोग, बुनियादी ढांचे का अनियंत्रित निर्माण, कोयला-खनिज खनन और अवैध रेत खनन इस संकट के प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा जलधाराओं के किनारे होने वाली रासायनिक खेती मिट्टी की पकड़ कमजोर कर रही है, जिससे मानसून के दौरान भूमि कटाव और गाद का जमाव बढ़ रहा है। नतीजतन नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है।

गैर-मानसूनी महीनों में इन जलधाराओं में पानी न होने से मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ रहा है। भूजल स्तर गिरने से देश की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा असर पड़ रहा है।   

इनके वाटरशेड्स के सिकुड़ने का सीधा असर केन और बेतवा के प्रवाह पर पड़ रहा है, और अंततः यह कमी गंगा की मुख्यधारा तक पहुंच रही है। किसी भी बड़ी नदी की अविरलता सूक्ष्म शिराओं से तय होती है। जब यही सूख जाएंगी, तो नदी का सूखना अपरिहार्य है। शोध के अनुसार, इसके पीछे अनियोजित भूमि उपयोग, बुनियादी ढांचे का अनियंत्रित निर्माण, कोयला-खनिज खनन व अवैध रेत खनन हैं। साथ ही जलधाराओं के किनारे होने वाली रासायनिक खेती भी। खेती से मिट्टी की पकड़ कमजोर होने से मानसून के दौरान तेजी से भूमि कटाव हो रहा है और उसके गाद के रूप में नदियों में भरने से जलधाराओं का दम घुट रहा है।
इस अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के बीच जब जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव जुड़ते हैं, तो यह संकट कई गुना गहरा हो जाता है। गैर-मानसूनी महीनों में इन जलधाराओं में पानी न होने के कारण मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ रहा है। साथ ही भूजल स्तर भी गिर रहा है, जिससे देश की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था व खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है। आईआईटी धनबाद के वैज्ञानिकों ने एक साहसिक नीतिगत हस्तक्षेप का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि अब नदियों के प्राकृतिक स्वरूप, उनके रिपेरियन जोन व पुराने प्रवाह मार्गों को पुनर्जीवित करने के लिए ‘नदी भूमि अधिग्रहण’ की नीति अपनाई जाए। नदियों के किनारों पर रासायनिक खेती को प्रतिबंधित कर वहां केवल प्राकृतिक वानिकी को बढ़ावा दिया जाए। नदियों के सिकुड़ने की दर, उनकी लंबाई और प्रवाह घनत्व के आधार पर ‘नदियों की लाल सूची’ तैयार करना जरूरी है, ताकि संकटग्रस्त नदियों को प्राथमिकता के आधार पर बचाया जा सके।

निष्कर्ष  –

आईआईटी धनबाद के वैज्ञानिकों ने इस संकट से निपटने के लिए साहसिक नीतिगत हस्तक्षेप का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि नदियों के प्राकृतिक स्वरूप और पुराने प्रवाह मार्गों को पुनर्जीवित करने के लिए ‘नदी भूमि अधिग्रहण’ की नीति अपनाई जाए। नदियों के किनारों पर रासायनिक खेती को प्रतिबंधित कर वहां प्राकृतिक वानिकी को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही ‘नदियों की लाल सूची’ तैयार कर संकटग्रस्त नदियों को प्राथमिकता के आधार पर बचाने की दिशा में कदम उठाए जाएं।

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