



अर्चक सप्तऋषि
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
काशी में शिवरात्रि के दिन अनेक प्रकार की बारात निकाली जाती है जिनके बाराती भूत, पिशाच, नाग, किन्नर, यक्ष, मानव, शिवगढ़ और सभी देवी देवता होते हैं
महाशिवरात्रि साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से सबसे महत्वपूर्ण पर्व है जो कि माघ फागुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को पूरे भारत में ही नहीं बल्कि पूरे दुनिया में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है भगवान शिव जी का अति महत्वपूर्ण पर्व है। हमारे ग्रंथों व पुराणों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि सृष्टि का आरंभ इसी दिन से हुआ था जिसके अनुसार एक अग्नि स्तंभ ( जो महादेव जी का विशालकाय स्वरूप है) से उदय हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था महाशिवरात्रि से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है जैसे कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान जो हलाहल विष निकला जिसमे की पूरे ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता विद्यमान थी भगवान शिव ने उसे हलाल विश्व को अपने कंठ में रख लिया था जिसके कारण उनका कंठ नीला पड़ गया इस कारण से उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है । हलाहल विष भगवान शिव जी द्वारा अपने कंठ में रखने के पश्चात शिव जी को अत्यधिक पीड़ा होने लगी जिसके कारण उनके उपचार के लिए रात भर देवी- देवताओं ने अलग-अलग नृत्य व संगीत बजाए, जिसके कारण शिव जी को नींद ना आए उसे रात को भी शिवरात्रि की रात ही कही जाती है ऐसा माना जाता है शिवरात्रि का पर्व हर जगह और प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग तरीकों से मनाए जाने की प्रथा व परंपराएं है उन्हीं में मनाए जाने वाली काशी की शिवरात्रि अनूठी और अनुपम है काशी में शिवरात्रि के दिन अनेक प्रकार की बारात निकाली जाती है जिनके बाराती भूत, पिशाच, नाग, किन्नर, यक्ष, मानव, शिवगढ़ और सभी देवी देवता होते हैं । जो की शिव बारात में अनेकों रूप धारण करके उनको जीवंत रूप देते हैं आपको एक बात और भी बताना चाहता हूं। काशी में शिव बारात निकालने की कोई निश्चित या लिखित रूप से प्रमाण नहीं मिलता है क्योंकि यह सदियों पुरानी परंपरा है यह मुख्य रूप से पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। पुरातन में शिव बारात बहुत ही शालीनता व अनेकों बघीयो के साथ निकाला जाता था जिसमें ढोल नगाड़े, मजीरा, शहनाई, मृदंग, डमरू हुआ करते थे। जो एक जीवंत शैली को दर्शाता था जिसको लोगों के द्वारा देखे जाने पर मन नहीं भरता था । बस मन करता है कि उसे अपने जेहन में उतार लू । आधुनिक शिव बारात आधुनिक शिव बारात में भी अनेक गाड़ियां निकाली जाती हैं जिन पर भगवान शिव वह माता पार्वती जी का रूप धारण किए हुए लोग होते हैं किंतु ढोल नगाड़ों की जगह आधुनिक कान फाड़ू बजाता है । जिसको लोग सुनते तो हैं किंतु भाव यह आता है कि जितनी जल्दी यहां से आगे चल जाए। यह आधुनिक और संक्षेप में शिव बारात की महिमा। इन्हीं मान्यताओं में एक मान्यता यह भी है कि जब भगवान शिव की पत्नी सती अपने पिता द्वारा अपमानित होने पर मृत्यु को अपनाया तो भगवान शिव में वैराग उत्पन्न हो गया हजारों हजार साल व्यतीत हो गए। इसका फायदा उठाते हुए असुर राज तारकासुर ने यह वरदान प्राप्त कर लिया कि आपके बनाए हुए इस समस्त लोक में कोई भी पुरुष मेरे सामान बलवान ना हो और शिवजी के द्वारा उत्पन्न हुआ पुत्र देवताओं का सेनापति बनाकर जब मेरे ऊपर शास्त्र प्रहार करें तब मेरी मृत्यु हो उसके बाद दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे ससुर का त्रिलोकी के राज्य पर अभिषेक कर दिया। उसके बाद उसने बलपूर्वक सभी को अपने अधीन कर लिया। वह सभी देवताओं को भी पीड़ा पहुंचाने लगा। उसी समय काल में हिमवान के घर माता पार्वती का जन्म हुआ। वह नारद मुनि द्वारा पार्वती जी का हाथ देकर उनके लक्षणों को बताया एवं हिमवान व उनकी पत्नी मैना को भगवान शिव की महिमा का उल्लेख किया एवं माता पार्वती जी का विवाह भगवान शिव जी के साथ करने का अनुरोध भी किया। भगवान शिव जी के अति प्रिय सप्तऋषियों ने भगवान शिव जी में उत्पन्न उनके वैराग को समाप्त किया एवं शिवजी की आज्ञा प्राप्त कर माता पार्वती जी की परीक्षा लेकर शिवजी को बताया एवं सप्तर्षियों द्वारा माता पार्वती का विवाह शिव जी से करने की प्रेरणा भी दी। वह सप्तर्षियों द्वारा ही शिवजी का विवाह करना इन्हीं मान्यताओं पर काशी में शिवरात्रि के दिन चार प्रहर की आरतियां होती है। जिसमें भगवान शिव व माता पार्वती जी का विवाह संपन्न कराए जाते हैं सभी शिवालय रात्रि पर्यंत खुले रहते हैं चारों प्रहर की आरतियों में लगने वाले भोग व अन्य सामग्री काशी वासियों द्वारा ही प्राप्त किया जाता है, चुकी भगवान शिव काशी के में एक गृहस्थ रूप में विद्यमान है । अपने पूरे परिवार के साथ तो इसलिए काशी में लोक परंपराएं भी उसी तरह उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं पहले राजाधिराज महाराज शिवाजी की तिलकोत्सव, हल्दी रस्म, विवाह एवं में गौना (रंग भरी एकादशी) बहुत ही धूमधाम से समस्त प्राचीन काशी वासियों द्वारा द्वारा मनाया जाता है।



