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समरसता समाज और देश को एकजुट करने,पारंपरिक भेदभाव को समाप्त करने का एक बड़ा सशक्त माध्यम है : आशीष चौहान

 

 

लखनऊ:- आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अवध प्रांत के लखनऊ महानगर द्वारा राजधानी के चिनहट एमिटी विश्विद्यालय में सामाजिक समरसता दिवस पर संगोष्ठी आयोजित का आयोजन हुआ जिसमें प्रवासी कार्यकर्ता के रूप में अभाविप के राष्ट्रीय संगठन मंत्री आशीष चौहान एवं मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित रामशरण वर्मा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एमिटी विश्विद्यालय के प्रति कुलपति अनिल विशिष्ट अभाविप लखनऊ महानगर उपाध्यक्ष डॉ०अशोक मोरल महानगर मंत्री शाश्वत सांस्कृत ने एक साथ युवाओं के प्रेरणाश्रोत स्वामी विवेकानंद व ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर संगोष्ठी का शुभारंभ किया।

कार्यक्रम में प्रवासी कार्यकर्ता व मुख्य वक्ता के रूप में समरसता पर युवाओं संबोधित करते हुए

अभाविप के राष्ट्रीय संगठन मंत्री ने कहा समरसता को लेकर ही स्वामी विवेकानन्द जी के चिंतन में भगवान बुद्ध के उपदेश का आधार मिलता है। उनका स्पष्ट मानना था कि समरसता के सिद्धान्त को हमने स्वीकार तो कर लिया है, विचार और बुद्धि के स्तर पर समाज ने मान्यता भी दे दी है। परन्तु इसे व्यवहार में परिवर्तित करने में हम असफल ही रहे है। समरसता के इस तत्व को सिद्ध और साध्य करने हेतु समरसता के व्यवहारिक तत्व को प्रचलित करना भी जरूरी है।

भारतवर्ष मे समय-समय पर अनेक राष्ट्र महापुरूषों ने जन्म लिया है। सम्पूर्ण समाज की स्थिति को सुधारने में राजाराम मोहन राय, डॉ. बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर जैसे राष्ट्र पुरुषों का यही प्रयास रहा है कि अभिजन वर्ग, बहुजन वर्ग, वंचित वर्ग, पिछड़ा वर्ग, घुमतू समाज, घुमंतु सुदृढ़ समाज व्यवस्था की अपेक्षा दुर्बल वर्ग के व्यक्तियों पर ज्यादा ध्यान दिया जाये।

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” को मानने वाली संस्कृति रही है। समरसता ही समाज एवं देश को एकजुट करने, पारम्परिक भेदभाव को समाप्त करने का एक बड़ा सशक्त माध्यम है। सभी समाजों को मिलाकर सभी जातियों के लिए एक शमशान, एक मंदिर, एक कुंआ निर्मित कर समाज को परस्पर मजबूत बनाना है। पर यह कार्य किसी एक व्यक्ति अथवा संस्था का नहीं हो सकता। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है। इस बुराई का खात्मा जागरूक व्यक्तियों के द्वारा ही किया जा सकता है। तभी समाज में वास्तविक समरसता का भाव उत्पन्न हो सकता है। लोगों को जागरूक करने के लिए उनमें प्रेम एवं अपनेपन की भावना के भाव की आवश्यकता है।

 

मुख्य अतिथि ने पद्मश्री रामशरण वर्मा ने कहा रामचरित चौपाई की पंक्ति को पढ़ते हुए कहा जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना। जहाँ कुमति तहँ विपत्ति निधाना ।।

परस्पर मिलकर विचार करो। विचारों से वाणी शुद्ध बनेगी। वाणी से कार्यों में एकता आयेगी। विद्वानजनों का यह स्वभाव रहा है कि हम सब मिलकर साथ चले। साथ संवाद करें, और मिलकर विचार करें।

अथर्ववेद में कहा गया है “सर्व आशा मम् मित्र भवन्तु” हम सब आपस में मित्र हैं। जिस तरफ भी मैं देखूं हर एक को अपना मित्र समझें। यह मंत्र मानव को प्ररेणा देता है कि हम मन और मस्तिष्क से एक साथ हों, ताकि एकता बनी रहे। जब तक हम समाज में एकता की भावना रखेगें, तो हमारा समाज स्वस्थ और प्रगतिशील रहेगा। वेदों के उपदेश का यही सार है: भाईचारा, दया, करूणा, सत्यनिष्ठा, साधुता को बढ़ाना।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एमिटी विश्विद्यालय के प्रति कुलपति अनिल विशिष्ट ने कहा कि सामाजिक विषमता मिटाने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ेंगे, क्योंकि व्यवहार में भले ही वह कम हुई हो पर मन से पूर्ण गई नहीं है। जैसे एक शिक्षक ने अपनी कक्षा के छात्रों को फलक पर खींची एक रेखा को बिना मिटाए छोटी करने को कहा वैसे ही यह कठिन लगता है। पर एक होशियार बालक ने उस रेखा के उपर एक बड़ी रेखा खींची और पहली वाली अपने-आप छोटी हो गई। छोटी अस्मिता मिटाने के लिए बृहद भाव जागरण करना पड़ेगा। यह भाव हिन्दुत्व का है। जाति व्यवस्था यह हिन्दुओं से जुड़ा विषय है इसीलिए यहाँ हिन्दुत्व का भाव जागरण कहना चाहिए।

कार्यक्रम की प्रस्तावना अभाविप लखनऊ महानगर उपाध्यक्ष डॉ०अशोक मोरल ने तथा आभार ज्ञापन महानगर मंत्री शाश्वत सांस्कृत ने किया।

समरसता दिवस पर अभाविप लखनऊ महानगर द्वारा आयोजित संगोष्ठी में अवध प्रांत संगठन मंत्री अंशुल विद्यार्थी जिला संयोजक लखनऊ पूरब आशुतोष राय सहित तमाम छात्र एवं छात्राएं उपस्थित रही।

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