
लखनऊ:- उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ब्राम्हण समाज की नाराज़गी खुलकर सामने आ गई है।भाजपा के भीतर ही यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि आखिर यह कैसा “संविधान” है, जिसमें एक वर्ग को आपसी बैठकों और सामाजिक जुटान की खुली छूट है,जबकि ब्राम्हण समाज के विधायकों और प्रतिनिधियों की बैठकों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हाल के दिनों में ब्राम्हण विधायकों की बैठक और समाज से जुड़े विमर्श पर जिस तरह आपत्ति जताई गई,उससे समाज में अपमान और उपेक्षा की भावना गहराई है।ब्राम्हण समाज का कहना है कि जब अन्य वर्गों, कुटुम्बों और सामाजिक समूहों को संगठनात्मक बैठकों और विचार-विमर्श की अनुमति है,तो केवल ब्राम्हण समाज की जुटान पर ही पाबंदी क्यों?
सूत्रों के अनुसार,ब्राम्हण समाज इसे समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ मान रहा है।समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि लोकतंत्र में हर समाज को अपने मुद्दों,अपेक्षाओं और भविष्य को लेकर संवाद करने का अधिकार है।इसे रोकना न केवल असंवैधानिक सोच को दर्शाता है,बल्कि इससे यह संदेश भी जाता है कि एक विशेष वर्ग को जानबूझकर दबाया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की दोहरी नीति भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।ब्राम्हण समाज लंबे समय से पार्टी का मजबूत आधार रहा है, लेकिन लगातार उपेक्षा और सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताने से नाराज़गी खुलकर सामने आने लगी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नेतृत्व का दायित्व समाजों को साथ लेकर चलने का होता है,ना कि उनके बीच भेदभाव का भाव पैदा करने का यदि समय रहते संवाद और संतुलन नहीं बनाया गया, तो यह नाराज़गी केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगी,बल्कि इसके सियासी नतीजे भी सामने आ सकते हैं।
फिलहाल यह मुद्दा भाजपा के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा का केंद्र बना हुआ है, और ब्राम्हण समाज की नाराज़गी पार्टी नेतृत्व के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखी जा रही है।



