
लखनऊ :- राजधानी लखनऊ में हाईवे हो या हो राजधानी की चलती फिरती सड़कें, प्राइवेट बसों में स्लीपर बस, ओवरलोड भारी वाहन और गैर जनपद टैक्सियों का हिसाब किताब सिर्फ आरटीओ, पुलिस ही नहीं यहां तक यातायात विभाग भी रखता है…
हम सोचते हैं कि यातायात कर्मियों को राजधानी में यातायात समस्या से संबंधित रखा गया है एवं जाम जैसी स्थिति में कर्मयोगी साबित होते होगे, पर ऐसा है नहीं। क्या वजह होती होगी जब एक यातायात कर्मियों की टीम किसी वाहन को रोकती हो और फिर अकेले में वाहन चालक या वाहन स्वामी से बात करती हो…?
ज्यादातर यातायात कर्मी वसूली में बढ़ोतरी कर रहे हैं, ऐसे यातायात कर्मियों की गिनती भी बढ़ती जा रही है, हाईवे से गुजरने वाले वाहन हों या राजधानी की सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों हों, यातायात कर्मियों की खास नजर सब पर बनी रहती है…
सूत्रों के मुताबिक यातायात कर्मी एक लिस्ट या चिन्हित वाहन नंबरों पर खास मेहरबान होते हैं। वसूली की एक डायरी जिसमें वाहनों की लिस्ट होती होगी, जिन्हें खास महत्व देना है और उन्हें इशारा करके आगे बढ़ा देना यातायात कर्मियों का दायित्व बन जाता है। जहां लिस्ट में नाम नहीं समझ लो कार्यवाही की सूली पर चढ़ने को तैयार या लिस्ट में शामिल होने का मौका….
ज्यादातर यातायात कर्मी अपने जिम्मेदारी और कर्तव्य को वसूली के तौर पर नीलाम कर चुके हैं, डग्गामार बस, स्लीपर बस और ओवरलोड भारी वाहनों से कैसे फायदा प्राप्त करना है और कैसे उन पर अपना दम दिखाना है यह उन्हें बखूबी आता है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि यातायत कर्मी ड्यूटी के समय ही नशे में होते हैं, पर हम खाकी वर्दी या सफेद नीली ड्रेस को एक गरिमा पूर्वक स्थान में देखते हुए कोई सवाल नहीं करते…?
ऐसे ही कई किस्से हैं जिसमें यातायात कर्मियों की मिली भगत और वसूली प्रकरण देखा गया है। यातायात पुलिस कर्मी का बर्ताव वाहनों के रोके जाने पर और लिस्टेड वाहनों के सामने से गुजरने पर देखा जा सकता है। कई मर्तबा एक ही बार में मामला मैनेज या सिलसिला महीने पर टिक जाता है….



