
लखनऊ:- लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय में स्थापित विधिक सहायता केंद्र द्वारा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 25 अगस्त, 2026 को लखनऊ पब्लिक स्कूल में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के प्रति बच्चों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विधि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. (डॉ.) आर. के. वर्मा एवं विधिक सहायता केंद्र के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) अभिषेक कुमार तिवारी के मार्गदर्शन में किया गया।

कार्यशाला को बच्चों की आयु एवं समझ के अनुरूप दो सत्रों में आयोजित किया गया। प्रथम सत्र कक्षा 2 एवं 3 के विद्यार्थियों के लिए तथा द्वितीय सत्र कक्षा 4 एवं 5 के विद्यार्थियों के लिए आयोजित किया गया।
कार्यशाला की शुरुआत अनुष्का सिंह द्वारा पॉक्सो अधिनियम, 2012 के परिचय एवं उद्देश्य से की गई। उन्होंने बच्चों को सरल भाषा में बताया कि पॉक्सो अधिनियम बच्चों को लैंगिक अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने वाला विशेष कानून है और इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना तथा उनके साथ होने वाले लैंगिक अपराधों के मामलों में उन्हें कानूनी संरक्षण देना है।
इसके बाद उन्होंने बच्चों को गुड टच और बैड टच के बीच अंतर समझाया। उन्होंने बच्चों को दैनिक जीवन से जुड़े सरल उदाहरणों के माध्यम से बताया कि यदि किसी स्पर्श से उन्हें असहज, डर या बुरा महसूस हो, तो उन्हें उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों को यह संदेश दिया गया कि उनका शरीर उनका अपना है और उन्हें किसी भी ऐसे व्यवहार के बारे में किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति को बताने का अधिकार है।
इसके बाद निशांत सिंह ने बच्चों को यह समझाया कि, यदि उनके साथ कोई गलत या असहज घटना होती है, तो उन्हें किसे रिपोर्ट करना चाहिए और मदद कैसे मांगनी चाहिए। उन्होंने बच्चों को बताया कि वे सबसे पहले अपने माता-पिता, शिक्षक, अभिभावक या किसी ऐसे भरोसेमंद व्यक्ति को बता सकते हैं जिस पर वे विश्वास करते हों। उन्होंने बच्चों को यह भी समझाया कि शिकायत या घटना की जानकारी देते समय बच्चे की बात को संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए। बच्चे का बयान कैसे दर्ज किया जाता है, इस विषय में भी सरल भाषा में जानकारी दी गई, ताकि बच्चों में पुलिस या कानूनी प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक डर न रहे। इसके साथ ही उन्होंने चिकित्सकीय परीक्षण की प्रक्रिया के बारे में बताया और समझाया कि आवश्यकता पड़ने पर मेडिकल जांच बच्चे की सुरक्षा एवं मामले की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। अंत में उन्होंने बच्चों को उपलब्ध कानूनी उपचार और सहायता के बारे में जानकारी दी तथा यह संदेश दिया कि किसी भी गलत घटना की स्थिति में चुप रहने के बजाय किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सहायता लेना आवश्यक है।
कार्यशाला के अगले चरण में आतिफा जहांगीर ने बच्चों को शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया के बारे में सरल भाषा में समझाया। उन्होंने बताया कि, यदि किसी बच्चे के साथ कोई लैंगिक अपराध होता है, तो उसकी सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना आवश्यक है और बच्चे को इस प्रक्रिया में आवश्यक सुरक्षा एवं सहायता प्रदान की जाती है। उन्होंने बच्चों को यह भी बताया कि किसी घटना की जानकारी सामने आने पर केवल परिवार की ही नहीं, बल्कि विद्यालय, शिक्षकों और समाज की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। विद्यालय एवं शिक्षक बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने, किसी शिकायत को गंभीरता से लेने और आवश्यकता पड़ने पर उचित अधिकारियों तक सूचना पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आतिफा जहांगीर ने बच्चों को यह संदेश दिया कि यदि वे स्वयं किसी गलत घटना का सामना करते हैं या किसी अन्य बच्चे के साथ ऐसा होते देखते हैं, तो उसे छिपाने के बजाय किसी भरोसेमंद वयस्क को बताना चाहिए।
पूरी कार्यशाला के दौरान वक्ताओं ने विषय को बच्चों की उम्र और समझ के अनुसार सरल, संवादात्मक एवं उदाहरण आधारित तरीके से समझाया। बच्चों को यह स्पष्ट रूप से बताया गया कि किसी भी गलत व्यवहार के लिए बच्चा जिम्मेदार नहीं होता और मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस का कदम है।
कार्यशाला का समापन निमिता गर्ग द्वारा प्रश्नोत्तर सत्र के साथ किया गया। उन्होंने बच्चों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया और उन्हें पॉक्सो अधिनियम एवं अपनी सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण बातों को दोहराकर समझाया।



