गर्मी की आग में न जलें जीवन – जल संरक्षण ही समाधान!


डॉ. राकेश कुमार भट्ट
शहरी विकास एवं आपदा प्रबंधन सलाहकार
नई दिल्ली। देश में गर्मी की तपिश बढ़ते ही सामुदायिक स्तर पर जल, स्वच्छता एवं स्वच्छता (डब्ल्यूएएसएच) सेवाओं की चुनौतियां चरम पर पहुंच जाती हैं। केंद्रीय जल आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल स्तर कुल क्षमता का मात्र 44.71 प्रतिशत रह गया है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से काफी कम है। यह कमी न केवल पेयजल आपूर्ति को प्रभावित कर रही है, बल्कि ग्रामीण एवं शहरी समुदायों में स्वच्छता व्यवस्था को भी ध्वस्त कर रही है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
गर्मियों में तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज होने से भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 6,533 ब्लॉकों में से 27 प्रतिशत में भूजल खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है, जिसमें राजस्थान जैसे राज्यों में 203 डार्क जोन हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल योजना चल रही है, वहां भी पाइपलाइनों के रिसाव और अधूरे ओवरहेड टैंकों के कारण जलापूर्ति बाधित हो रही है। मुरादाबाद जैसे जिलों में गर्मी की शुरुआत होते ही ग्रामीणों को टैंकरों पर निर्भर होना पड़ रहा है, जबकि योजना के करोड़ों के कार्य अधर में लटके हैं। सामुदायिक स्तर पर यह संकट महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है, जो दूर के हैंडपंपों या कुओं से पानी लाने को मजबूर हैं।
स्वच्छता की दृष्टि से गर्मी का मौसम और भी चुनौतीपूर्ण साबित होता है। यूनिसेफ और सीईईडब्ल्यू की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 40 प्रतिशत जिलों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में डब्ल्यूएएसएच सेवाओं को जलवायु चरम घटनाओं से उच्च जोखिम है। गर्मी से नदियां और तालाब सूखने लगते हैं, जिससे शौचालयों में जल की कमी हो जाती है और खुले में शौच की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। स्वच्छ भारत मिशन के बावजूद, ग्रामीण समुदायों में सामुदायिक शौचालयों का रखरखाव कठिन हो जाता है, क्योंकि जल की कमी से सफाई असंभव हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप डायरिया, हैजा जैसी जलजनित बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है। 2024 में हीट स्ट्रोक से जुड़ी 25,000 से अधिक घटनाओं के साथ जल संकट ने स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाला।
सामुदायिक स्तर पर ये चुनौतियां आर्थिक और सामाजिक रूप से भी विनाशकारी हैं। किसान सिंचाई के लिए भूजल पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, जिससे कुएं सूख रहे हैं और फसलें प्रभावित हो रही हैं। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन ने पारंपरिक जल स्रोतों को नष्ट कर दिया है। ग्रामीण पंचायतों में जल एवं स्वच्छता समितियां (वीडब्ल्यूएससी) गठित की गई हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और संसाधनों का अभाव उन्हें अप्रभावी बना रहा है। दाउंटुअर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, सामुदायिक सहभागिता के बिना जल स्रोतों का पुनर्जीवन असंभव है। गर्मी में पसीने और धूल से हाथ धोने की आदत टूट जाती है, जो संक्रमण फैलाने का प्रमुख कारण बनती है।
सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। जल जीवन मिशन को 2028 तक बढ़ाने का प्रस्ताव विचाराधीन है, जिसमें सूखाग्रस्त क्षेत्रों में वैकल्पिक स्रोत विकसित किए जा रहे हैं। स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत ग्राम पंचायतों को जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने ‘सफाई अपनाओ, बीमारी भगाओ’ अभियान शुरू किया है, जो जल जमाव और कचरा प्रबंधन पर केंद्रित है। हालांकि, सामुदायिक स्तर पर सफलता के लिए स्थानीय भागीदारी अनिवार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रिप सिंचाई, वर्षा जल संचयन और सामुदायिक जल संरक्षण समितियों को मजबूत करने से संकट कम किया जा सकता है।
गर्मी के इस मौसम में सामुदायिक स्तर पर डब्ल्यूएएसएच चुनौतियां न केवल स्वास्थ्य संकट पैदा कर रही हैं, बल्कि सामाजिक असमानता को भी गहरा रही हैं। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तत्काल कार्रवाई न हुई, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो जाएगी। ग्रामीण भारत, जहां 70 प्रतिशत आबादी रहती है, वहां पेयजल और स्वच्छता की उपलब्धता सुनिश्चित करना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। सामुदायिक जागरूकता, सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और जल संरक्षण की आदतें ही इस संकट से मुक्ति दिला सकती हैं। देश को एकजुट होकर इस लड़ाई को लड़ना होगा, ताकि गर्मी की आग में जीवन न जल उठे।



