
दिल्ली:- भारत में शराब प्रथा आज भी एक गंभीर सामाजिक कुरीति के रूप में समाज को खोखला कर रही है। विवाह के समय कन्या पक्ष से वर पक्ष द्वारा विरोध, गाड़ी, संपत्ति और महंगे सामान की मांग न केवल परिवार पर आर्थिक भार बढ़ाया जा रहा है, बल्कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और आक्रामकता का बड़ा कारण भी बन रही है।
देश में अपहरण हत्या के मामलों में सख्त कानून लागू होने के बावजूद कमी नहीं आ रही है। कुछ दिनों में देश के अलग-अलग राज्यों से सामने आई घटनाओं में एक बार फिर समाज और व्यवस्था दोनों को कटघरे में खड़ा किया गया है।
NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में असलहे में हत्या के 5,737 मामले दर्ज किए गए। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में औसतन हर दिन 16 महिलाओं की जान डावर की वजह से चोरी हो गई। यह स्थिति महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सोच पर गंभीर सवाल उठाती है।
गरीबों की भारी मांग के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार भारी कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। कई परिवार अपने जीवनभर की जगह बेटी की शादी में खर्च कर देते हैं। यही कारण है कि कई जगहों पर बेटियों को आज भी “बोध” समझा जाता है, जिससे कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर घटनाएं भी सामने आती हैं।
शराब की मांग पूरी न पर महिलाओं को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। कई मामलों में घरेलू हिंसा, आत्महत्या और डकैती हत्या आदि घटनाएं भी सामने आती हैं। हाल के वर्षों में फिल्मांकन के मामलों ने समाज और कानून व्यवस्था दोनों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
भारत सरकार ने सख्त कानून बनाए हैं। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। सिद्धदोष पर न्यूनतम 5 वर्ष की सजा और सिद्धांत का परीक्षण है। वहीं भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत शराब पीकर महिला के खिलाफ पति और उसके रिश्तेदारों पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
विशेषज्ञ का मानना है कि सिर्फ आर्थिक शोषण के खिलाफ कानून बनाना काफी नहीं है, बल्कि समाज की सोच को बदलना भी जरूरी है। दहेज प्रथा सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं है, बल्कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक बड़ा कारण है। शादी के बाद प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के कई मामले तलाक की मांग से जुड़े पाए जाते हैं। बेटियों को शिक्षित, आत्मनिर्भर और समान अधिकार लेना ही इस कुप्रथा को जड़ से खत्म किया जा सकता है। समाज को त्यागना नहीं, बल्कि संस्कार और अन्याय के खिलाफ महत्वपूर्ण कदम उठाना होगा, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर प्रभावी रोक लगाना।
हालाँकि सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानूनी प्रस्ताव बनाए हैं, लेकिन इसके बावजूद भी महिलाओं की रिहाई पर रोक नहीं लग पा रही है। सामाजिक विद्वानों का कहना है कि कानून के साथ-साथ समाज में जागरूकता और सोच में बदलाव बेहद जरूरी है, तभी इस कुप्रथा पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।
लगातार बढ़ते मामलों ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। अब सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि समाज की सोच की भी जरूरत है।



