
दिल्ली:– भारतीय रिजर्व बैंक एक बार फिर प्लास्टिक के नोट यानी पॉलीमर बैंकनोट लाने की पुरानी योजना को सक्रिय कर रहा है| पिछले कुछ सालों में नोटों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है, इसलिए RBI अब कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक के नोट छापने पर गंभीरता से विचार कर रहा है|
जल्द हो सकती है पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत –
आरबीआई के पिछले दो बोर्ड मीटिंग में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई| बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक के नोटों के उत्पादन की लागत कम होने और इनकी ज्यादा उम्र के फायदे को देखते हुए यह फैसला लिया जा रहा है| जल्द ही आम लोगों के लिए प्लास्टिक नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा की जा सकती है| रिपोर्ट में मामले से अवगत एक सूत्र के हवाले से बताया गया है कि प्लास्टिक नोट छापने की लागत कागज के नोटों से काफी कम है| साथ ही एटीएम मशीनें भी इन नोटों को आसानी से पहचान सकेंगी|
वित्त वर्ष 2024-25 में कागजी नोट छापने पर RBI को 6,372.8 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े, जो पिछले साल से ज्यादा था| साथ ही गंदे और खराब हो चुके नोटों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है| FY25 में 23.8 अरब गंदे नोट नष्ट किए गए, जो पिछले साल से 12.3 फीसदी ज्यादा थे. ज्यादातर 500 रुपए और 100 रुपए के नोट खराब हो रहे हैं. अभी देश में कुल सर्कुलेशन वाले नोटों की वैल्यू 42.86 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई, जो पिछले साल से 11.5 फीसदी ज्यादा है. छोटे नोटों जैसे 10 रुपए और 20 रुपए की मांग ज्यादा है, लेकिन कुल नोटों में इनकी हिस्सेदारी बहुत कम है|
डेढ़ दशक पहले भी बना था ऐसा ही प्लान –
यह पहली बार नहीं है, जब रिजर्व बैंक प्लास्टिक के बैंक नोट लाने पर विचार कर रहा है| पहले भी साल 2012 में UPA सरकार ने पांच शहरों में 10 रुपए के प्लास्टिक नोटों का ट्रायल करने का फैसला लिया था, लेकिन उस समय तकनीकी चुनौतियों के कारण योजना रद्द हो गई थी| अब सूत्र बता रहे हैं कि पिछले 10 साल में तकनीक काफी बेहतर हो गई है और एटीएम के साथ कोई समस्या नहीं रहेगी|
60 से ज्यादा देशों में चल रहे हैं प्लास्टिक के नोट –
दुनिया में पहले से ही 60 से ज्यादा देश प्लास्टिक के नोट इस्तेमाल कर रहे हैं| ऑस्ट्रेलिया सबसे पहले 1988 में प्लास्टिक नोट लाया था| सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, कनाडा आदि देशों में भी यह व्यवस्था सफल रही है| RBI का मानना है कि प्लास्टिक के नोट ज्यादा दिनों तक चलेंगे, कम गंदे होंगे और सरकार की छपाई की लागत भी घटेगी| हालांकि अभी यह सिर्फ पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू होगा|



