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एल नीनो की वापसी के संकेत, भारत में मानसून, गर्मी और हिमालयी क्षेत्रों पर पड़ सकता है बड़ा असर – 

 

 

दिल्ली:-  प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में तेजी से बदलाव के संकेत मिलने के बाद दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की नजरें एक बार फिर एल नीनो पर टिक गई हैं। नवीनतम जलवायु आकलनों के अनुसार, पृथ्वी दोबारा एल नीनो की स्थिति में प्रवेश कर सकती है और वर्ष के उत्तरार्द्ध में इसके अत्यधिक शक्तिशाली रूप लेने की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एल नीनो मजबूत होता है तो इसका प्रभाव भारत के मानसून, कृषि, जल संसाधनों और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है। साथ ही दुनिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, सूखा और चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।

एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह सामान्य से अधिक गर्म हो जाती है। इसके कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और वर्षा के पैटर्न में बदलाव आता है। भारत में इसका सीधा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ सकता है, जिससे वर्षा का वितरण असमान होने की आशंका रहती है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में कई ऐतिहासिक सूखे एल नीनो वर्षों से जुड़े रहे हैं। हालांकि हर एल नीनो कमजोर मानसून का कारण नहीं बनता, लेकिन शक्तिशाली एल नीनो के दौरान सामान्य से कम वर्षा और लंबे शुष्क दौर की संभावना बढ़ जाती है।

जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि एल नीनो के प्रभाव से देश के कई हिस्सों में लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं। तापमान सामान्य से अधिक रहने, जल स्रोतों पर दबाव बढ़ने और बिजली की मांग में वृद्धि होने की संभावना है। इसका असर कृषि उत्पादन और जनस्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

हिमालयी राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के लिए भी स्थिति चिंताजनक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि एल नीनो के दौरान वर्षा का स्वरूप अधिक अनिश्चित हो सकता है, जिससे बादल फटना, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है। साथ ही बढ़ते तापमान से ग्लेशियरों के पिघलने और हिमनदीय झीलों के विस्तार की आशंका भी बढ़ सकती है।

एल नीनो क्या है – 

एल नीनो (El Niño) प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाली एक प्राकृतिक एवं चक्रीय मौसम संबंधी घटना है। इसके दौरान मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का समुद्री तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है, जो पूरी दुनिया के मौसम,बारिश और तापमान के पैटर्न को बदल देता है।

 

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और एल नीनो का संयुक्त प्रभाव दुनिया भर में चरम मौसम संबंधी घटनाओं को और अधिक गंभीर बना सकता है। ऐसे में भारत के लिए जल संरक्षण, कृषि प्रबंधन, मौसम पूर्वानुमान प्रणाली और आपदा तैयारियों को मजबूत करना आवश्यक होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाएगी, क्योंकि वहां होने वाले बदलाव भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम की दिशा तय कर सकते हैं।

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