

विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला के 29वें दिन भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक –
गुरु वशिष्ठ ने विधि-विधान से कराया प्रभु श्रीराम का राजतिलक, माता सीता और चारों भाइयों के साथ सिंहासन पर विराजे रघुनंदन
रातभर श्रद्धालुओं ने किए प्रभु श्रीराम के दर्शन, भोर में काशी नरेश की उपस्थिति में हुई अलौकिक आरती, राममय हुआ पूरा वातावरण
वाराणसी/रामनगर। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में आयोजित विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला के 29वें दिन भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की भव्य एवं अलौकिक लीला का मंचन किया गया। प्रभु श्रीराम के अयोध्या के राजसिंहासन पर विराजमान होते ही संपूर्ण वातावरण जय श्रीराम के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। भगवान के राजतिलक के इस पावन अवसर पर रामनगर की अयोध्या नगरी में आस्था, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला।
सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार आयोजित इस लीला में गुरु वशिष्ठ द्वारा भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक कराया गया। माता जानकी और चारों भाइयों के साथ राजसिंहासन पर विराजमान प्रभु श्रीराम की मनोहारी छवि देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

गुरु वशिष्ठ ने कराया श्रीराम का राज्याभिषेक
रामलीला के 29वें दिन की कथा का शुभारंभ उत्तरकांड के प्रसंगों के गायन के साथ हुआ। लीला में गुरु वशिष्ठ ने संत समाज की उपस्थिति में भगवान श्रीराम को दिव्य राजसिंहासन पर विराजमान कराया।
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिव्य सिंहासन मागा।।
भगवान श्रीराम के राजसिंहासन पर विराजमान होते ही अयोध्या में रामराज्य की स्थापना का मनोरम दृश्य प्रस्तुत हुआ। चारों ओर आनंद और मंगल का वातावरण छा गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो संपूर्ण सृष्टि प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक का उत्सव मना रही हो।
देवताओं और चारों वेदों ने की प्रभु श्रीराम की वंदना
राज्याभिषेक के पश्चात लीला में आकाश से देवताओं और चारों वेदों के आगमन का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। सभी ने भगवान श्रीराम और माता सीता की स्तुति कर उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान किया।
इसके बाद भगवान शंकर के आगमन और प्रभु श्रीराम की भक्तिपूर्ण वंदना का भावपूर्ण मंचन हुआ।
जय राम रमा रमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।
भगवान शिव ने श्रीराम की महिमा का गुणगान करते हुए उनकी स्तुति की और इसके बाद कैलाश के लिए प्रस्थान किया। इस प्रसंग के दौरान रामायण की चौपाइयों और भक्ति भाव से ओतप्रोत गायन ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सुग्रीव, अंगद और अन्य योद्धाओं की विदाई का भावुक प्रसंग
राज्याभिषेक के बाद भगवान श्रीराम ने लंका विजय में सहयोग देने वाले अपने सभी मित्रों और योद्धाओं को सम्मानपूर्वक विदा करने का निर्णय लिया।
प्रभु श्रीराम ने सभी से कहा कि उन्होंने कठिन समय में उनका साथ देकर मित्रता और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। अब वे अपने-अपने गृह लौटकर उनका स्मरण और भजन करें।
भगवान ने सभी को वस्त्र और आभूषण प्रदान कर सम्मानित किया। इस दौरान अंगद की विदाई का प्रसंग अत्यंत भावुक रहा।
अंगद प्रभु श्रीराम से अलग नहीं होना चाहते थे। उन्होंने भगवान के चरणों में रहकर उनकी सेवा करने की इच्छा व्यक्त की। अंगद का प्रेम और समर्पण देखकर उपस्थित श्रद्धालु भी भावविभोर हो उठे।
भगवान श्रीराम ने अंगद को स्नेहपूर्वक समझाया और उन्हें अपने राज्य लौटने की आज्ञा दी।
हनुमान जी की भक्ति और अंगद का प्रेम देख प्रसन्न हुए प्रभु
लीला में आगे हनुमान जी द्वारा सुग्रीव से कुछ दिनों तक अयोध्या में रुकने की अनुमति मांगने का प्रसंग प्रस्तुत किया गया।
इसी दौरान अंगद ने हनुमान जी से आग्रह किया कि वे प्रभु श्रीराम को उनका स्मरण कराते रहें। अंगद की इस भावना को हनुमान जी ने भगवान श्रीराम तक पहुंचाया।
अंगद का अपार प्रेम और समर्पण सुनकर प्रभु श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए। इस प्रसंग ने भगवान और उनके भक्तों के बीच अटूट प्रेम तथा निष्ठा का सुंदर संदेश दिया।
उत्तरकांड के गायन में हुआ रामराज्य की महिमा का वर्णन
रामलीला के दौरान रामायण के उत्तरकांड का पारंपरिक गायन चलता रहा। इसमें भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में स्थापित आदर्श रामराज्य का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया।
रामराज्य में प्रजा की सुख-समृद्धि, आपसी प्रेम, धर्म, न्याय और आदर्श शासन व्यवस्था का भावपूर्ण चित्रण किया गया।
पारंपरिक रामायण गायन और व्यासपीठ से प्रसंगों की व्याख्या ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा।
काशी नरेश ने पंचस्वरूपों के चरण स्पर्श कर निभाई परंपरा
रामनगर रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार श्रीराम राज्याभिषेक के अवसर पर काशी नरेश ने पंचस्वरूपों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
इसके बाद काशी नरेश अपने किले के लिए प्रस्थान कर गए। इसी के साथ दिन की लीला का विश्राम हुआ, लेकिन भगवान श्रीराम के दर्शन का क्रम समाप्त नहीं हुआ।
राज्याभिषेक के बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और चारों भाइयों के साथ पूरी रात अयोध्या के राजसिंहासन पर विराजमान रहे।
इस दुर्लभ अवसर पर रामनगर और वाराणसी सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने रातभर प्रभु के दर्शन किए।
भोर में काशी नरेश की उपस्थिति में हुई अलौकिक आरती
रामनगर रामलीला की सबसे अनूठी परंपराओं में शामिल राज्याभिषेक के बाद की भोर की आरती का दृश्य अत्यंत मनोहारी रहा।
परंपरा के अनुसार सूर्योदय के समय काशी नरेश अपने किले से पैदल चलकर अयोध्या पहुंचे। इसके बाद भगवान श्रीराम की विशेष आरती संपन्न हुई।
लाल और सफेद मुहताबी की रोशनी के बीच जब प्रभु श्रीराम की आरती आरंभ हुई तो संपूर्ण वातावरण अलौकिक आभा से भर उठा।
राजसिंहासन पर माता सीता और चारों भाइयों के साथ विराजमान भगवान श्रीराम की दिव्य छवि देखकर श्रद्धालु भक्ति में लीन हो गए।
आरती के दौरान श्रद्धालुओं के मुख से निकल रहे जय श्रीराम और हर-हर महादेव के जयघोष ने वातावरण को और अधिक भक्तिमय बना दिया।
रातभर अयोध्या में डटे रहे श्रद्धालु, दुर्लभ दर्शन कर हुए निहाल
भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक और भोर की विशेष आरती के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूरी रात अयोध्या में मौजूद रहे।
श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर केवल रामलीला का एक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवनभर स्मरण रहने वाला आध्यात्मिक अनुभव रहा।
रामनगर की रामलीला में राज्याभिषेक के बाद भगवान के रातभर सिंहासन पर विराजमान रहने और सूर्योदय के समय विशेष आरती की परंपरा इस आयोजन को विशिष्ट बनाती है।
भक्तों का कहना है कि प्रभु श्रीराम के इस स्वरूप के दर्शन करना सौभाग्य की बात है। भगवान की कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद से मिलने वाले ऐसे दुर्लभ दर्शन जीवन को धन्य कर देते हैं।
आस्था, परंपरा और भक्ति का अद्भुत संगम है रामनगर की रामलीला
काशी की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला अपनी प्राचीन परंपराओं, पारंपरिक रामायण गायन और जीवंत मंचन के लिए विशेष पहचान रखती है।
यहां रामकथा के प्रसंगों का मंचन केवल अभिनय के रूप में नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक अनुष्ठान के रूप में किया जाता है।
29वें दिन श्रीराम राज्याभिषेक की लीला ने मर्यादा, धर्म, न्याय, त्याग और आदर्श शासन व्यवस्था का संदेश दिया।
भगवान श्रीराम के राजसिंहासन पर विराजमान होने से लेकर भोर की अलौकिक आरती तक पूरा रामनगर राममय बना रहा। श्रद्धालुओं के लिए यह दृश्य अविस्मरणीय रहा।
जय सियाराम! जय श्रीराम! हर हर महादेव!



