
वाराणसी:– पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के वाग्देवी मंदिर प्रांगण में व्याकरण विभाग के अंतर्गत आयोजित मासिक शास्त्रार्थ सभा का शुभारम्भ पितृ प्रो. बिहारी लाल शर्मा द्वारा किया गया।
मूर्तिपूजक प्रोफेसर शर्मा ने कहा कि काशी में देवभाषा संस्कृत का संरक्षण एवं संरक्षण परंपरा अत्यंत प्राचीन एवं गौरवशाली रही है। यहां की विद्वत परंपरा ने न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर संस्कृत ज्ञान के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान प्रणाली की आत्मा है, जिसके माध्यम से तर्क, शास्त्र संवाद एवं सत्य की उत्पत्ति होती है। वर्तमान समय में इस परंपरा को जीवित रखना नितांत आवश्यक है, जिससे नई पीढ़ी में शास्त्रीय ज्ञान की प्रति रुचि और गहन समझ विकसित हो सके।

कार्यक्रम के व्याकरण व्याकरण विभाग के सहायक आचार्य डॉ. दिव्य चेतन ब्रह्मचारी ने इस आयोजन के माध्यम से पारंपरिक शास्त्रार्थ परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन का प्रयास किया।
शास्त्रार्थ सभा में व्याकरण, वेदांत, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र जैसे विभिन्न विषयों पर दो बिन्दुओं के बीच तर्क पूर्ण एवं अंतिम संवाद हुआ।
पितृ पक्ष द्वारा सहभागियों को
प्रमाणित प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।
संघ में शिवराम दास, हरिओम, अजित जॉय, सुदर्शन भट्टराई, सहयोगी कुमारी (व्याकरण), अविनाशदर्श शुक्ला, हर्ष मिश्र, चैतन्य (वेदांत), शालिनी पांडे, साकी पांडे (न्याय), सुनन भट्टराय, राजगुरु (मीमांसा), झंटू तिवारी, शिवा त्रिपाठी (धर्मशास्त्र) और डॉ. विंटर स्कॉट एवं अंश चाणक (दर्शनशास्त्र) ने सक्रिय की।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष एवं विद्वान आचार्य प्रो. महेंद्र कुमार पांडे, प्रो. विजय कुमार पांडे, डॉ. विल्वेश कुप्पा, डॉ. नितिन आर्य, डॉ. श्रवण दास, आचार्य रवि प्रकाश एवं आचार्य अनुज मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए व्याकरण शास्त्र की मह पर प्रकाश डाला और विद्यार्थियों को सतत अध्ययन, मनन एवं प्रेरणा के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं की उपस्थिति ने शास्त्रार्थ परंपरा के प्रति रुचि को दर्शाया।



