
दार्शनिक समाचार –
लखनऊ:- राजधानी लखनऊ में कई पुलिसकर्मी अपने दायित्व, जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाने के लिए सच्ची निष्ठा से तत्पर अपने कार्यशैली में ढालने की कोशिश जरूर करते हैं, पर ऐसे भी कुछ पुलिसकर्मी तैनात हैं, जिनका मन और दिल दोनों सिर्फ फायदे पर टिका रहता है। कई ऐसे पुलिसकर्मी हैं, जो नशे के अड्डे को फायदे का अड्डा समझ चुके हैं, तो कुछ विवेचना को कचहरी की तरह तारीख पे तारीख की तरह टालमटोल करते हुए निस्तारण में फायदा ढूंढते हैं। कुछ उम्मीद करते हैं कि कोई घटना हो और आरोपी उनके दरवाजे आए। तो कुछ ठेलों से वसूली करने में दिलचस्पी रखते हैं….
ऐसा भी है कि राजधानी में उच्च अधिकारियों द्वारा अतिक्रमण व कानून व्यवस्था पर ज्यादा जोर देने के लिए निर्देशित किया जाता है, हालांकि इस संबंध में कई ऐसे थाने की पुलिस है, जो अपने कर्म व कार्य में जिम्मेदारी और कर्तव्य को प्राथमिकता देते हैं। अपने क्षेत्र में कानून व्यवस्था और अतिक्रमण मुक्त रखने में सफल भी हुए हैं। पर अक्सर कहा जाता है गेहूं के साथ घुन जरूर पिस्ता है…
वैसे ही कुछ कर्म से भटकते हुए पुलिसकर्मियों की वजह से कर्म योगी पुलिसकर्मी भी उनके चपेट में आ ही जाते हैं। क्षेत्र में नशे के अड्डों को बढ़ावा देना यानी भली भांति फायदे का स्थल ढूंढ लिया है। कुछ ऐसे पुलिसकर्मी है जो विवेचना निस्तारण करने योग्य ही नहीं है, पर फिर भी विवेचना के लिए उतावले रहते हैं।
आखिर जेब के आगे पीड़ित की समस्या कहां…?,
अपने फायदे के आगे दूसरे की पीड़ा कहां…?
मामला बनेगा नहीं तो लाभ होगा कैसे…?
जिम्मेदारी और कर्तव्य बन गई है फायदे की एक ढाल…!
बात करें फ़ायदे की तो क्या वर्दी पहनने का महत्व सिर्फ़ फ़ायदा ढूँढ़ना जैसा हो गया है…?, अपने कर्तव्य को निभाना नहीं, दिए गए क्षेत्र को स्वस्थ व सुरक्षित रखने का जिम्मा लेना नहीं …?, वैसे भी हम कैसे भाप सकते हैं कि किसी पुलिसकर्मी के मन में और दिल को कि क्या चल रहा है…?
हां उनके मीठे बोल और गतिविधि को जरूर भांपा जा सकता है। वैसे भी आज के समय में क्या कोई बिना किसी फायदे के किसी का कार्य करता है, अगर करता है तो उसे काटने के लिए फायदा निकालने वाले बैठे हैं। जो अच्छे कार्य कर सकता है, उसे अच्छी खासी जिम्मेदारी क्यों नहीं सौंपी जाती, जो मक्खनबाजी में हुनर रखते हैं, उनसे उच्च अधिकारी क्यों संतुष्ट रहते हैं…?
उच्च अधिकारी ऐसों को बड़ी जिम्मेदारी क्यों नहीं सौंपते, जो जिम्मेदारी और कर्तव्य को निभाने के लिए जी और जान दोनों लगाना जानते हैं…?, ऐसा क्यों है की जो जिम्मेदारी योग्य नहीं हैं उन्हें ही जिम्मेदारी दे दी गई है?, जो खटकते हैं समाज में उन्हें ही क्यों दे दी गई है जिम्मेदारी…?, समाज में कानून व्यवस्था बरकरार रखना और वातावरण को दूषित करना क्या आज के समय में बराबर हो गया है…?
ऐसा देखा गया है कि मामलों में फायदा ढूंढा जाता है, कहीं व्यापारी का दोस्त बना लिया जाता है, तो कहीं आरोपी के साथ चाय पिया जाता है और कहीं ऐसा भी होता है कि अपराध या अवैध कार्य हो रहा हो और क्षेत्र की पुलिस लापता हो जाती है….
आज के समय में कई पुलिसकर्मियों की वर्दी की गरिमा जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाना नहीं, बल्कि फायदा ढूंढना में क्यों हो गई है…?, कम से कम कमजोर से फायदा ना वसूलों, कि फायदा भी आपसे फायदा की उम्मीद करने लगे….
ऐसा क्यों है कि कई पुलिसकर्मी जहां से फायदा हो उसी की तरफ से कार्यवाही भी करते हैं…?
कुछ सवालों के घेरे में आज की पुलिस फंसी हुई है, सवाल पूछने वाले कम हैं, पर सवाल उठाता जरूर है….
• क्या आज पुलिस विवेचना निस्तारण करने में असमर्थ है…?
• क्या आज पुलिस मामले में से नाम हटाने के पैसे मांगती है…?
• क्या चौकी की पुलिस के पास उच्च अधिकारियों तक पैसे पहुंचाने का मेनू कार्ड होता है…?
• क्या पुलिस पीड़ित के समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ है….?
• क्या पुलिस किसी को भी झूठे मुकदमे में फंसा सकती है….?
• क्या नशे के अड्डे में पुलिस ज्यादा दिलचस्पी रखती है…?
आगे के लेख में ज़िक्र करेंगे कुछ नामों का, जो वर्दी और उसकी गरिमा को भूल कर, अपने फायदे के लिए अपने क्षेत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ नामों का ज़िक्र करेंगे जिनमें कमी है, फिर भी उच्च अधिकारी उनके मक्खनबाजी और जी हजूरी से प्रसन्न हो कर संतुष्ट हैं। ज़िक्र आपसे भी होगा और उच्च अधिकारियों से भी….



