काशी में जिस चन्द्रकूप-जलतीर्थ का नाम सुन देव-ऋषि पितृगण होते हर्षित और तृप्त;उसी चन्द्रकूप में परछाई नहीं दिखने से होती मृत्यु,ऐसा दुष्प्रचार करते,विधर्मी रील वाले –

✍️नवीन तिवारी
वाराणसी:- आईये जाने वास्तविकता और चन्द्रतीर्थ स्थित चन्द्रकूप की पौराणिक महत्ता.
भूतभावन भगवान् विश्वनाथ की नगरी काशी के सिद्धेश्वरी महाल, संकटा मंदिर मार्ग पर अवस्थित वैकलतीर्थ के निकट ही देवाधिदेव महादेव का चन्द्रेश्वर लिंग और पवित्र चन्द्रतीर्थ है, जहाँ पर स्नान कर चन्द्रेश्वर के पूजन करने से चन्द्रलोक प्राप्त होता है। यहां श्रद्धालु भक्तों को प्रातःकाल चन्द्रकूप के जल से स्नान करके विधिवत् सन्ध्या और तर्पणादि समस्त उदक्-क्रियाओं को समाप्त कर, चन्द्रोद तीर्थं के समीप ही सविधि श्राद्ध आरम्भ करना चाहिए –
आवाहनार्घ्यरहितं पिंडान्दद्यात्प्रयत्नतः ।
वसुरुद्रादितिसुतस्वरूपपुरुषत्रयम् ।।५२
इस तीर्थ-श्राद्ध में आवाहन और अर्घ्यदान न करे, वसु, रुद्र और आदित्य- स्वरूप पिता, पितामह, प्रपितामह – इन तीनों पुस्तो का प्रयत्नपूर्वक पिण्डदान करे.
मातामहांस्तथोद्दिश्य तथान्यानपि गोत्रजान् ।
गुरुश्वशुरबंधूनां नामान्युच्चार्य पिंडदः ।। ५३
इसी प्रकार मातामहादिक पुरुष-त्रय तथा और भी सगोत्र, गुरु ,श्वशुर एवं बन्धुगण का नामोच्चारण करता हुआ पिण्डदान करना चाहिए.
कुर्वञ्छ्राद्धं च तीर्थेस्मिञ्छ्रद्धयोद्धरतेखिलान् ।
गयायां पिंडदानेन यथा तुप्यंति पूर्वजाः ।। ५४
तथा चंद्रोदकुंडेऽत्र श्राद्धैस्तृप्यंति पूर्वजाः ।
गयायां च यथा मुच्येत्सर्वर्णात्पितृजान्नरः ।। ५५
तथा प्रमुच्यते चर्णाच्चंद्रोदे पिण्डदानतः ।
यदा चंद्रेश्वरं द्रष्टुं यायात्कोपि नरोत्तमः।।५६
तदा नृत्यंति मुदितास्तत्पूर्वप्रपितामहाः।।
अयं चंद्रोदतीर्थेस्मिंस्तर्पणं नः करिष्यति ।। ५७
इस तीर्थ में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से सबका उद्धार हो जाता है। गया में पिण्डदान करने से पूर्वजों की जैसी तृप्ति होती है, इस चन्द्रकूप पर भी श्राद्ध करने से पूर्वजों की वैसी ही तुष्टि होती है। मनुष्य जैसे गया के पिण्डदान करने से पितृ-ऋण से मुक्त होता है, वैसे ही जब कोई नरोत्तम चन्द्रेश्वर के दर्शनार्थं चलता है, तब उस समय उसके पूर्वज प्रपितामह आदि प्रभूत हर्ष से नृत्य करने लगते हैं। कहते हैं कि “यह चन्द्रकूप तीर्थ में हम लोगों का तर्पण करेगा”
अस्माकं मंदभाग्यत्वाद्यदि नैव करिष्यति।
तदातत्तीर्थ संस्पर्शादस्मत्तृप्तिर्भविष्यति।। ५८
यदि हम सबके दुर्भाग्यवश तर्पण न करेगा तो क्या हुआ? उस तीर्थ का जल तो स्पर्श करेगा ही, उसी से हम लोगों की तृप्ति हो जायेगी।
स्पृशेन्नापि यदा मंदस्तदा द्रक्ष्यति तृप्तये।
एवं श्राद्धं विधायाथ स्पृष्ट्वा चंद्रेश्वरं व्रती।
संतर्प्य विप्रांश्च यतीन्कुर्याद्वै पारणं ततः।।५९
यदि मूर्खता वश जल का भी स्पर्श न करेगा, तो उसे देखेगा तो सही फिर उसी से हमारा सन्तोष हो जायेगा।” व्रती नर उक्त विधि से श्राद्ध-सम्पन्न कर पश्चात् चन्द्रेश्वर के दर्शन-स्पर्शन के अनन्तर और यतिगण को भोजनादिक के द्वारा सन्तुष्ट होने पर तब अपने व्रत का पारण करे।
एवं व्रते कृते काश्यां सदर्शे सोमवासरे।
भवेदृणत्रयान्मुक्तो मृगांकमदनुग्रहात्।।६०
काशी में इस विधि से सोमवती अमावस्या पर व्रत करने से, मेरे ही अनुग्रह के कारण देव-ऋण, ऋषि-ऋण एवं पितृ ऋण से वह मुक्त हो जाता है।
अत्र यात्रा महाचैत्र्यां कार्या क्षेत्रनिवासिभिः।
तारकज्ञानलाभाय क्षेत्रविघ्ननिवर्तिनी ।। ६१
चंद्रेश्वरं समभ्यर्च्य यद्यन्यत्रापि संस्थितः ।
अघौघपटलीं भित्त्वा सोमलोकमवाप्स्यति ।।६२
काशी क्षेत्र-निवासियों को चित्रा नक्षत्र-युक्ता चैत्रमास की पूर्णिमा को तारक- ज्ञान के लाभार्थ, क्षेत्र विघ्न-विध्वंसिनी महायात्रा करनी आवश्यक है और यदि कोई, चन्द्रेश्वर लिंग का पूजन करके अन्यत्र भी जाकर मृत्यु को प्राप्त होता है, तो पापपुञ्ज की पंक्ति को भेदकर चन्द्रलोक में पहुँच जाता है।
कलौ चन्द्रेशमहिमा नाभाग्यैरवगम्यते।
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि परं गुह्यं निशापते ॥६३
कलि-काल में भाग्यहीन लोग चन्द्रेश्वर की महिमा को नहीं जान सकते हैं। हे निशापते ! एक बात परम गुह्यतम होने पर भी तुमसे कहता हूँ।
सिद्धयोगीश्वरं पीठमेतत्साधकसिद्धिदम् ।
सुराऽसुरेषु गन्धर्वनागविद्याधरेष्वपि।।६४।
रक्षोगुह्यकयक्षेषु किन्नरेषु नरेषु च।
सप्तकोट्यस्तु सिद्धानामत्र सिद्धा ममाप्रतः॥६५
यह स्थान सिद्धयोगीश्वर पीठ है और साधकों के लिये सिद्धिप्रद है। सुर, असुर, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, राक्षस, गुह्यक, यक्ष, किन्नर और मनुष्यगण के मध्य से सात करोड़ साधक, मेरे सन्मुख यहाँ पर सिद्ध हो चुके हैं।
षण्मासं नियताहारो ध्यायन् विश्वेश्वरीमिह ।
चन्द्रेश्वरार्चनायातान् सिद्धान् पश्यति सोऽग्रगान् ॥६६
छः मास पर्यन्त नियत आहार विहार पूर्वक विश्वेश्वरी का ध्यान करने से चन्द्रेश्वर लिंग के पूजार्थ समागत यहाँ पर सिद्धगण को देखने लगता है।
कृपया ध्यान दे..छः मास अर्थात् छः माह –